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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 690 में से

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पृष्ठ 102

' अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६७
अष्टपदी ॥
पहिले अनहदनाद खुलैहिय ऊपरै ।
कंठ सु नीचे रोंकि ध्यान ह्वांईं धरै ॥
जहांअपरबल होय जु अनहद शब्दही ।
फिरियों जानो जाय कंठ के मध्यही ॥
तहां किये अभ्यास ध्यान राखैधना ।
होवै अधिकीनाद सुनै साधूजना ॥
केतक द्योसन माहिं ब्रह्म रन्धरकनै ।
जाय खुलै जहँ नाद सुरतिदै ह्वां सुनै ॥
शनै शनै यो होय जानेंकोइ साधही ।
हिरदय अरु ब्रह्मलोकलों एकैनादही ॥
मीठी और सवाद बहुतही पाइये ।
सतगुरु के परताप जहां मनलाइये ॥
ब्रह्मलोककी बात सुनै होवै जुह्वां ।
सबही सूझैं वस्तु जुकछु होवैं तहां ॥
दो० अनहद के सम औरना, फल बरणे नहिं जाहिं ।
पटतर कछू न देसकूं, सब कछु है वा माहिं ॥
पांच थकै आनंद बढ़ै, अरु मनुआ वश होय ।
शुकदेवकहि चरणदाससुनि, आपअपनजाखोय ॥
नाड़िन में सुपमन बड़ी, सो अनहद की मात ।
कुम्भक में केवल बड़ा, सो वाही का भ्रात ॥
मुद्रा बड़ी जु खेचरी, वाकी बहिनी जान ।
अनहद सा बाजा नहीं, और न या सम ध्यान ॥
सेवक से स्वामी.भवै, सुनै जु अनहद नाद ।