भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरणदास शुकदेव कहैं यों। आसन दोनों बरणौं हैं ज्यों ॥
अथ पद्मासनविधि ॥
पहिले आसन पदम बताऊं। ज्यों की त्यों मूरति दिखलाऊं ॥
पहिले बावां पांव उठावै। दहिनी जङ्घा ऊपर लावै ॥
दहिना पांव फेरि यों लावै। बांवीं साथल ऊपर राखै ॥
बावां कर पीछे सों लावै। बाम अँगूठा गहि तन तावै ॥
ऐसे हाथ दाहिना लावै। दहिन अँगूठा पकड़ दृढ़ावै ॥
ग्रीवालटक चिबुक हिये आवै। नासा आगे दीठि लगावै ॥
दिव्यदृष्टि हो कौतुक दरशै। कहै शुकदेव अभैपद परशै ॥
दो० कै हिरदै राखै चिबुक, कै सम राखै देह।
कै घौटों दोउ हाथ रखि, कै अँगूठा गहिलेह ॥
अथ सिद्धासनविधि ॥
दूजा आसनसिद्ध जुकीजे। बावां पांव गुदाढिग दीजै ॥
दाहिन पांव लिंगपर आवै। दृष्टि सुभ्रुकुटी पै ठहरावै ॥
अचरज जहां अधिक दरशावै। खुले कपाट मोक्ष गति पावै ॥
आसन साधि व्याधि परिहरै। भूख नींद जोपै वश करै ॥
दो० एड़ी पावै पांव की, सीवन मध्ये राख।
लिंग गुदा के मध्य में, मूल बोलिये साख ॥
संयम सूं इन्द्री गहै, राखै सरल शरीर।
दृष्टि उठा भ्रुकुटी धरै, मिटै जु दोनों पीर ॥
दहिनी लावै लिंगपर, भाग बराबर राखि।
बारी बारी कीजिये, शुकदेवा कहै भाखि ॥
अथ प्राणायामअंग वर्णन ॥
चौथे प्राणायामही, कहूँ सुनौ चित लाय।
जाबल जीवै पनकुं, चढ़ै गगन कूं धाय ॥