भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 94, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टाङ्गयोगवर्णन । ५६
ब्रह्मचारी भोजन करै इतना । पठनमाहिँबीरजरहै जितना ॥
दशवां शौच पबित्तर रहिये । कर दातौन हमेश नहइये ॥
जो शरीर में होवै रोगा । रहै न तन जल छूवन योगा ॥
तौ तन माटी से शुधि कीजै । अबअंतरकी शुधि सुनलीजै ॥
राग द्वेष हिरदय सों टारै । मन सों खोटे कर्म निवारै ॥
दो० दशप्रकारका कहा यह, पहिल योगकी नीव ।
नेम कहूं अब - दूसरा, सो है साधन सीव ॥
अथ नेमअंगवर्णन ॥
दूजा अंग नियम का गाऊं । भिन्न भिन्न सब अंग सुनाऊं ॥
पहला तप इन्द्री वश कीजै । इनके स्वाद सभी तजि दीजै ॥
खातें पीतैं सोवत जागत । योगी इन्द्रिन कूं वश राखत ॥
तनकूं वश कर मनकूं मारै । ऐसी विधि तपका अँगधारै ॥
दूजा अंग कहूं संतोषा । हानि भये नहिं माने शोका ॥
लाभ भये नाहीं हरषावै । ऐसी समझ हिये में लावै ॥
परारब्ध तन होय सु होई । सँकलप बिकलपरखैनकोई ॥
दो० तीजा आस्तिक अंग है, जाका सुनो विचार ।
समझ समझ मनमें धरो, ताको गहो संभार ॥
शास्त्र सुने परतीत जो कीजै । सत्तब्रह्म निश्चय करिलीजै ॥
बुध निश्चय आतम के माहीं । जगत सांच करि मानै नाहीं ॥
चौथा दान अंग विधि होई । पात्र कुपात्र विचारै सोई ॥
एक दान उपदेश जु दीजै । भवसागर सों पार करीजै ॥
दूजा दान अन्न अरु पानी । दीजै कीजै बहु सनमानी ॥
१ इन्द्रियवश, संतोप, आस्तिक, शास्त्रचिंतन, दान देना, ईश्वराराधन,
सिद्धांतश्रवण, लाजयुक्त, तत्त्वदृद, जाप ये दशअंग नियमके कहलाते हैं ॥