भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 111, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें७६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ऐसी पँचवीं भस्त्रिका, रहै न कोई आंठ ॥
ब्रह्मनाड़िका के छिद्र माहीं। रोंकिरही मुखदेरहि ह्नाहीं ॥
लाय लपेटै नाभी ठाहीं। दृढ़है बैठी सरकै नाहीं ॥
सवा बिलस्त कि जाकीदेही। तामें अस्थित जीव सनेही ॥
शक्ति नांगिनी यही जु कहिये। याके भेद गुरूंसों लहिये ॥
महा अपरबल जागै नाहीं। ताते नर सब मरिमरि जाहीं ॥
कोइ इक योगी ताहि डुलावै। सुपमन बाट गगन लैजावै ॥
ब्रह्मरंध्र में जाय समावै। लगै समाधि बहुत सुखपावै ॥
जो कछु होय सो कहा न जावै। चरणदास शुकदेव सुनावै ॥
दो० शिव शक्ति भेलाभ वय, रहै न द्वितिया भाव ।
कुण्डलिनी परबोधका, जो कोइ करै उपाव ॥
शिष्यवचन ॥
व्यास पुत्र शुकदेवजी, किरिपाकरी दयाल ।
चरणदास आधीनही, समझो भयो निहाल ॥
एकबार फिरि खोलिकै, कुण्डलिनी समुझाव ।
याके सबही भेद को, सुनबेको अतिचाव ॥
गुरुवचन ॥
फिरभी तोसों कहतहौं, कुण्डलिनी विस्तार ।
ताके सगरे भेदही, सुनिकै हियमें धार ॥
नाभिस्थान नागिनि रहै, कुण्डल शशी अकार ।
प्राण पियारा वही है, आगे सुनो विचार ॥
कुंभक कर्म कोई करै, देवै शक्ति जगाय ।
जैसे लागी लष्टिका, नागन शीश उठाय ॥
सीखी गुरूंसों कुंभक साधै। नीकी विधि ताको अवराधै