भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बायें सेती रेचिये, हौरै हौरै जान ।
कपाल धौंकनीजानिये, चरणदास पहिचान ॥
दो० वायु किरम पीड़ा हरै, कीजै वारंबार ।
कुम्भक सूरज भेदनी, शुकदेव कहै हियधार ।
अथ ऊजाई ॥
अब ऊजाई कुम्भक सुनिये । समझ सीखमन माहीं गुनिये ॥
दोउ सुर समकर पवन चढ़ावै । पेट कण्ठ लौं ताहि भरावै ॥
ताको रोकै दृढ़ करि राखै । सहजइड़ा सों रेचक नाखै ॥
ऐसे जो कोई साधन करै । रोग सलेषम के सब हरै ॥
हिरदय कण्ठ माहिं जो होई । कफका रोग रहै नहिं कोई ॥
रोग जलन्धरही का भागै । भजै वायु दुख पावक जागै ॥
बैठत चलत पवनको भरै । यही उजाई कुम्भक करै ॥
चरणदास शुकदेव बतावै । तीजी शीतकार समुझावै ॥
अथ शीतकार
दो० ओड़ जँभाई नासिका, लीजै खिंचै जु पौन ।
ताहि कछू ठहरायकै, छोड़ै मुख सों जौन ॥
धीरे धीरे खैंचिये, सीसी शब्द उचार ॥
सुन्दर होवै तेजवन्त, अधिक रूप को धार ॥
भूख प्यास व्यापै नहीं, आलस नींद न होय ।
तनचेतनही होत है, रहै उपाधि न कोय ॥
यहि विधि साधतही रहै, होय योगिन मैं भूप ।
चरणदास शुकदेव कहि, कुम्भक यही अनूप ॥
अथ शीतली
कहूँ शीतली कुम्भक आगे । जो कोइ करै भागतिहि जागे ।
तालु मूल जिह्वा बल सेती । प्राण वायु पीवै कर हेती ॥