भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अपान वायु ज्योंज्यों बढ़ै, चक्र चक्र के पास ।
त्यों त्यों सीधै होय सब, पूरा जान अभ्यास ॥
अपान वायु आवै जबे, चक्र अनाहद माहिं ।
दश प्रकार के नादही, शनैःशनैः खुलि जाहिं ॥
पहिले नाद सुनै जो ऐसा । चिड़ी चीकला बोलै जैसा ॥
एकहि बार कहै यों चिन्न । दूजीबार कहै चिन चिन्न ॥
क्षुद्रघंट ज्यों तीजी जानौ । चौथी नाद शङ्ख पहिंचानौ ॥
पँचवीं नाद बीन ज्यों गाजै । छठवीं उपज ताल ज्यों बाजै ॥
सतवीं नाद मुरलिया ऐसी । अठवीं उठै पखावज जैसी ॥
नवै नफ़ीरी नाद सुनावै । दशवें सिंह गरज उपजावै ॥
नौ तजि दशवैं सूं हित लावै । अनहद सुनि अनहद होजावै ॥
होय जीव सो ब्रह्म अगाधा । जो कोइ सुनै सुअनहदनादा ॥
दो० खुलै जो अनहदनाद ज्यों, सोसाधन सुनि लेहु ।
जासों पहुँचै सिद्धि को, या करणी चित देहु ॥
चक्राधार सों खैंचि करि, अपान वायु सजलेह ।
स्वाधिष्ठान के पासही, तीन लपेटै देह ॥
याकीविधि सब तोहिं सुनाऊं । जैसे है तैसे समझाऊं ॥
पहिले मूल द्वार को शोधै । बंध लगाय अपान निरोधै ॥
पहिले चक्कर में ठहरावै । खैंचि दूसरे के ढिग लावै ।
वाके आसौ पास फिरावै । दहिने तीनि लपेट लगावै ॥
फिरि मणिपूरक में पहुंचावै । फेरि अनाहद में लैजावै ॥
अनहद खुलै सुनै सुखपावै । फिरिहांप्राण अपान मिलावै ॥
हिरदय कंठ मध्य ठहरावै । संयम सों ताको पहुंचावै ॥
बंध दूसरो तहां लगावै । चरणदासं शुकदेव बतावै ॥