भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टाङ्गयोगवर्णन । ७३
चरणदास के मन विषे, सुनबेको अति चाय ॥
गुरुवचन
अब आठौ कुम्भक कहूँ, नावँ भेद गुण रूप ।
शुकदेव कहैं परसिद्ध हैं, योगहि माहिं अनूप ॥
प्रथम कुम्भकही कहूँ, नावँ जु सूरज भेद ।
दूजे ऊजाई सुनो, साधे छूटै खेद ॥
शीतकार अरु शीतली, पाँचवीं भस्त्रक जान ।
छठीं जु अमरी नाम है, नीके समझि पिछान ॥
नावँ मूर्छा सातवीं, अठवीं केवल होय ।
रणजीता सबसे बड़ी, आयु बढ़ावै सोय ॥
पवन पूर पूरकही कीजै । पाछे बन्ध जलन्धर दीजै ॥
कुंभक रेचकके मधि जानौ । ह्याईं बन्ध उड्यान पिछानौ ॥
पवन जोरही सूं गहि लीजै । अध ऊर्ध्व संकोच न कीजै ॥
मध्यम कीजै पश्चिम तानै । ब्रह्म नारिके माहिं समानै ॥
नाड़ीं पवन खैंचिये ऐसे । भरिये सब संध्यान जु जैसे ॥
अपान वायु कुं ऊपर लावै । प्राण वायु नीचे लै जावै ॥
जोपै यह साधन बनि आवै । योगी बूढ़ा होन न पावै ॥
तरुण अवस्था देखै ऐसी । नितहीरहै जानिये जैसी ॥
अथ सूर्यभेदन ॥
कुं० कुम्भक सूरज भेदही, पहिले देहुं सुनाय ।
सुख आसन कै कीजिये, अथवा वज्र लगाय ॥
अथवा वज्र लगाय, पूरक दहिने स्वर कीजै ।
नख शिख सेती रोंकि, वायू कुं बन्ध करीजै ॥