भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 106, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टाङ्गयोगवर्णन । ७१
रेचकही के कर्म दोय निश्चय भये ॥
दो रेचक के कर्म पूरक के तीनहीं ।
ये सबही रहिजायँ होय जब छीनहीं ॥
पूरक रेचक छुटै केवल कुम्भकयही ।
ठौर समैका बंध न राखै नाशही ॥
या किरियाको अन्त जानौ तुम हां तहीं ।
प्राणवायु को रोकै कायाके महीं ॥
दो० साठहजार इक्कीसलख, सबके श्वास परमान ।
यह तौ रोकै देहमें, जबलग एकहि प्रान ॥
याकेहू ये सौ दिना, साधन भवै जु सिद्धि ।
केवल कुम्भक जानिये, पूरी हवै जु विद्धि ॥
अष्टपदी ॥
इतनी होवै शक्ति रुकन जब श्वासकीं ।
रहै नहीं परमाण जु गिनती मासकी ॥
द्वादशकै सौ बर्ष सहस कै लाखही ।
चाहै जब लग रखै सांच यह साखही ॥
गुप्त महा यह जान कठिन है साधना ।
कोटिनमें कोइ एक करै आराधना ॥
देखा देखी बहुत मनुष याकू लगैं ।
कोई चढ़ै परमान घने मगमेंथकैं ॥
चरणदास यह समझि कहें शुकदेवहीं ।
शनैशनै सों करै पांय या भेवही ॥
दो० मूल बंध अरु खेचरी, मुद्राही को जान ।
दोनोंके साधे बिना, होय अपान न प्रान ॥
खेचरि मुद्राकहूँ बखानै । जाको कोटिन में कोइ जानै ॥
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