भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टाङ्गयोगवर्णन । ६५
षोड़श दल जीव देवता, षोड़श अक्षर हेर ॥
छठयों भौंहन बीच में, अज्ञा चक्कर सोय ।
ज्योति देवता जानिये, दो दल अक्षर दोय ॥
शिष्यवचन ॥
कमलों पर अक्षर कहे, समझ न आई मोहिं ।
कौन कौन अक्षर तहां, सतगुरु कहिये सोहिं ॥
गुरुवचन ॥
पहिला कमल अधार सुनाऊं । वशषस अक्षर वरण बताऊं ॥
दूजा कमल जु स्वाधिष्ठाना । बा भा माया रल जु बखाना ॥
तृत्तिये मणिपूरक जो कहिये । डा ढा णा ता था ही लहिये ॥
दा धा ना पा फा जो गाये । ये दश अक्षर वरण बताये ॥
चौथे चक्र अनाहद माहीं । द्वादश अक्षर वरण बताहीं ॥
का खा गा घा ङा जो जान । चा छा जा झा ञ ट ठ जुमान ॥
पँचवां षोड़श विशुद्ध जो आछे । आदि अकार अकार सुपाछे ॥
छठा जो अज्ञा चक्कर मानौ । हंस वरण दो अक्षर जानौ ॥
दो० भवँर गुफा मंडल अखंड, तिरवेणी जहँ न्हान ।
नित परबी जहाँ होत है, करै पाप की हान ॥
उलट पवन बेधै षटन, ऊपर पहुंचै जाय ।
शुकदेव कहैं चरणदासजू, सुषमन सहज समाय ॥
कमलसहस दल सातवां, शीश मध्यही वास ।
तहां देवता सचगुरु, पूरी करै जो आस ॥
ह्यांतक सुषमन का सिरा, सो सातौ की नाल ।
हैं वे उलटे षट कमल, तलै अपान बयाल ॥
अपान् वायु कूं साधिकरि, ऊपर लावै मोड़ ।
जब होवै उलटे कमल, मुख अकाशकोओड़ ॥