भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
धर्मजहाजवर्णन । ४५
ऐसे रहि शुभ कर्म्म जु करें । सदा मौत से सब जन डरें ॥
सहज सहज फिरि वहदिन आया। डरे नहीं शुभकर्म्म कमाया ॥
आपसमें कहें हमको क्या है। यमकी मार नरक भय नाहै ॥
राजा जान्यो वह दिन आया। अपना सेवक तुरत पठाया ॥
कही कि फौज सबै वनि आवैं । कतल करन परजा को धावैं ॥
फौजें सजिकरि ठाढ़ी भईं । आज्ञा ओर दृष्टि जो दई ॥
राजाके मन ऐसी आई । उन सब पुरुपन लेहुँ बुलाई ॥
सांचे सबही के इतवारी । फेरि बुलावो अवकी वारी ॥
यही शोचि फिरि शीश उठाया। आज्ञाकारी निकट बुलाया ॥
दो० कामदार सों यों कही, वैसो पुरुप बुलाय ।
जिनमें मिलिवैठा प्रथम, हरिसों ध्यान लगाय ॥
फिरि उनहिंन को लियो बुलाई। मिलि बैठा सबका सुखदाई ॥
कहीकि सब मिलि सुरति उठावो। रामओर को ध्यान लगावो ॥
अज्ञा होय सोइ तुम मानौ । मेरा दोप कछू मत जानौ ॥
मोको अज्ञा होय सो करिहौं। अपने हिये नेकनहिं धरिहौं ॥
राजा कहि मिलि ध्यान लगाया। ऐसा शब्द गगनसों आया ॥
राजा मैं अब बकसि दियाहै। सकल प्रजाको शुद्ध हियाहै ॥
जिन पर मोको कोप भया था। तिनके कारण खड्ग लियाथा ॥
सर्व प्रजा सो वातें डारी। करिसुकर्म हरिभक्ति सँभारी ॥
दो० ताते अज्ञा यों दई, रचो कुटुँव घरवार ।
शुभकर्म्मन को कीजिये, खोटे कर्म्म निवार ॥
राजाकही खोलि दृग दीजै। अज्ञाभई सोई अब कीजै ॥
खोलि आँख कर जोरिके भाखे। बकसे गये तुम्हारे राखे ॥
जो तुम कहौ सोई अब करें। बचन तुम्हारे हिरदय धरें ॥
राजा कही यही तुम कीजो। रामनामको संगी लीजो ॥
४६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गुरुको ध्यान धरो मनमाहीं । विपति जासुसों आवतनाहीं ॥
अपनी त्रिया त्रियाकरि जानो । परतिरियाको माता मानो ॥
परधन को पाहन १ सम देखो । शुभकर्मनको करो विशेखो ॥
बोलौ सांच झूठको नाखो । निन्दा हिंसा नेक न राखो ॥
है रहियो सबके सुखदाई । करुवा वचन न बोलौ भाई ॥
जो व्यवहार करौ सो सांचा । लोक प्रलोक न आवै आंचा ॥
दो० भाषत श्रीशुकदेवजी, सुनौ चरणही दास ।
राजा ने उपदेश दै, खोई सबकी त्रास ॥
फिरि वै पुरुष बिदा है आये । हरि राजाके वचन सुनाये ॥
जिन बातनसों बकसे सारे । सो रखियो तुम हिये मँझारे ॥
उज्ज्वल कर्म भूलि मति जैयो । हरिकीभक्ति माहिँही रहियो ॥
सुनिकरि आपसमें फैलाई । एक एक ने सुनी सुनाई ॥
सबने मानी निश्चय कीन्ही । प्रकट २ सुअपनी आंखिनं चीन्ही ॥
हाथ कँगनको दर्पण केहा । जैसी करणी भुगतै जेहा ॥
खुशीभये लागे व्यँवहारा । रामभक्तिको लिये सँभारा ॥
कहि शुकदेव चरणहीदासा । सकल प्रजा रहै उमगहुलासा ॥
दो० चरणदास सुनिये श्रवण, मैं उपदेशूं तोहिं ।
जो पहिले हरिको भजै, पाछे दुःख न होहिं ॥
कथा कहौं इक और पुरानी । करणी करै सुसमुझै प्रानी ॥
इन्दुनाम इक ब्राह्मण हुता । जाके दश सुत अरु इक सुता ॥
सुता व्याहि दइ घरकी हुई । जाके पीछे माता मुई ॥
पिता मुवा दश पुत्र रहेथे । आपसमें सब बैठि कहेथे ॥
ऐसी कछू जु करणी कीजै । जगमें ऊंची पदवी लीजै ॥
इकने कही हूजिये भूपा । सुन्दर देही धरौ अनूपा ॥
१ पत्थर २ जाहिर ॥
धर्मजहाजवर्णन । ४७
तेज मुल्कमें होवै भारी । हुकुम जुमानैं नर अरु नारी ॥
और एक ऐसे उठि बोला । सावधान ह्वै अन्तर खोला ॥
दो० राजाही का हुकम तो, थोरेही में जोय ।
ऐसी करणी कीजिये, भूपचक्रवै होय ॥
एकद्वीप नौखण्ड में, जाको पूरो राज ।
एक और उठि बोलिया, यह भी ओछा साज ॥
चक्रवर्त्ति१ में इन्द्र बड़, देवन हूँ को भूप ।
उम्र बड़ी आनंद बड़े, दुख की लगै न धूप ॥
करणी करत इन्द्रही लोगा । होकर राजा कीजै भोगा ॥
जहाँ अप्सरा नृत्य करत हैं । सुन्दर अधिकी रूप धरत हैं ॥
और बड़ा भाई यों भाखा । सुरपतिहूको नाहीं राखा ॥
कहा कि पदवी ब्रह्माकीसी । और न दीखै काहू हीसी ॥
जाके एक दिवसही माहीं । चौदह इन्द्र सर्व ह्वै जाहीं ॥
सब ब्रह्मण्ड आसरे वाके । बिनशिजायँ मिटिजायँ जाके ॥
तीनि लोकका पिता वही है । वेद पुराणन माहँ कही है ॥
करणी करिकरि ब्रह्मा हूजै । ऐसी पदवी क्यों नहिं लीजै ॥
दो० सगरे यों उठि बोलिया, सत्य सत्य यह बात ।
ऐसाही अब कीजिये, ठहराई सब भ्रात ॥
दशहू करन तपंस्या लागे । पारब्रह्मकी ओरी पागे ॥
अधिक तपस्या कीन्ही भारी । मास सूखिगया दीखैं नारी ॥
हाड़ त्वचा२ चिपटी रहगई । लोहू धातु३ कछू ना ठई ॥
सब जन चित्रहिसे रहगये । कठिन तपस्या करते भये ॥
फूलपात जलहू नहिं लीन्हा । ऐसा तप दशहूने कीन्हा ॥
तन त्यागे दूजेही जन्मा । दशहू भ्रात हुये जो ब्रह्मा ॥
१ चारों दिशाओं का राजा २ खाल ३ वीर्य ॥
४८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जिनके दश ब्रह्माण्ड बने हैं। एकएक तिनमाहिं ठने हैं ॥
करणी कबहुँ न निष्फल जावै । जो मनधारे सोई पावै ॥
दो० करणी सों भये इन्द्रहु, करणी ब्रह्मा सोय ।
करणी सों ईश्वर भये, शुकदेवा कहै गोय ॥
दश हजार इक बीसही, वर्ष तपस्या कीन्ह ।
हरिजाको बदलो दियो, मांगो सो वर दीन्ह ॥
चारौ युगके माहिं जो, करणीही परधान१ ।
गुरु शुकदेवा कहत है, चरणदास उरआन ॥
उज्ज्वल कर्म्मन के कियें, दिनदिन उज्ज्वलहोय ।
मनमें उपजै भक्तिही, प्रेम पदारथ सोय ॥
चरणदास तुम करणी कीजो । याही में मन नीके दीजो ॥
ऐसा जन्म बहुरि नहिं पैहै । बीतिजाय पुनि बहु पछितै हैं ॥
मनुष देह को दुर्लभ जानौ । याको पा शुभकरणी ठानौ ॥
यो देही में करी कमाई । जाय स्वर्ग में नौनिधि पाई ॥
भक्तिकरी देही के माहीं । जा बैकुण्ठ सु आये नाहीं ॥
या देही में ज्ञान भया है । जीव ब्रह्म जो होय गया है ॥
मूरख करणी को नहिं जानै । कथनी कथिकथि बहुत बखानै ॥
थोथी कथनी काम न आवै । थोथा फटकै उड़ि उड़ि जावै ॥
दो० कथनीही के बीचमें, लीजो तत्त्व२ विचार ।
सार सार गहि लीजियो, दीजो डारि असार ॥
थोथी कथनी वही जु जानौ । बिन करणी जो करै बखानौ ॥
लोक प्रलोक न शोभा पावै । बकिबकिबकि खाली रहिजावै॥
कथनी के शूरा बहु जाने । करणी में कायर अरु याने ॥
शूरा वही जु करणी करै । दया धर्म्मलै सन्मुख अरै ॥
१ मुख्य २ पृथ्वी अप् तेज वायु आकाश ॥
धर्मजहाजवर्णन । ४६
पाँव धरे सो नाहीं उठावै । करणी करता चला जु जावै ॥
फिरै जबहिं फल लैकर आवै । सो वह शूरा मल्ल कहावै ॥
कायर बीचहि सों फिरि आवै । सो वह करणी को बिसरावै ॥
आपन खोट न जानै भोंदू । वह तौ कथनीही का गोंदू ॥
दो० ऐसे जगमें बहुत हैं, वैसे जगमें नाहिं ।
कोई कोइहि देखिये, सतगुरु के मग माहिं ॥
होनहार को बहुत बतावैं । पै ताको कछु मर्म न पावैं ॥
कहैं कि होनी होय सुहोई । ताको मेटिसकै नहिं कोई ॥
याको समझ उपाय न करिया । श्रद्धा तजि कायरह्वै परिया ॥
समझि निखट्टु¹ गृही भहे । वेष धारि बिन करणी रहे ॥
जानतनाहिं जु पिछिली करणी । अब कै भई जु होनी भरणी ॥
परालब्ध² अरु भाग्य कहावै । पिछले कर्म्मन से उपजावै ॥
अबके करै सु आगे पावै । कछू कछू फल अभी दिखावै ॥
कै काहू गाली दै देखो । कै काहू को मारि विशेखो ॥
कै काहूको अशन खवावो । कै काहूको शीश नंवावो ॥
कै करि चोरी द्यूतहि³ खेलौ । कै काहूको गुस्सा झेलौ ॥
दोनों का फल आगे आवै । चरणदास शुकदेव बतावै ॥
प्रगट देखिये यही तमाशा । नीच ऊंच करणी परकाशा ॥
दो० कोटि यही उपदेश है, यही जु सगरी बात ।
करणीही बलवंत है, यों शुकदेव दिखात ॥
मनकी करणी ज्ञान है, परमातम लखिलेय ॥
ब्रह्मरूप है जाय जब, छूटै सबही भय ॥
भवसागर⁴ में भय घने, ताकी लगै न आंच ॥
झूठेको भय बहुत है, भय नहिं व्यापै सांच ॥
१ कोईकाम न करनेवला २ कर्म्म ३ जुवां ४ संसार ॥
५० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
करणीही सों पाइये, पारब्रह्म का खोज ।
सतगुरु पै चलि जाइये, मेटै सबही सोज ॥
इच्छाब्रह्म करी सोइ करणी । ईश्वर रूप धरालै धरणी ॥
महतत् करि अहँकार जुकीये । तीनरूप^१ उनको करिदीये ॥
राजस^२ तामस^३ सात्त्विक^४ जानौ । एही त्रैगुण मनमें आनौ ॥
राजस सों जगको उपजावै । सात्त्विक सों पालै सिरजावै ॥
तामस सों विनशावै तोड़ै । बहुत सृष्टि नहिं भूपर जोड़ै ॥
जोड़ै तौ वह कहां समावै । धरती का परमाण^५ कहावै ॥
योजन पचास क्रोड़ बताई । वेद पुराणन में जो गाइ ॥
धरती करणीही सों ठाढ़ी । कछुवा शेष भये जो आढी ॥
करणीही सों घन वरसावै । वादल मिलती पवन चलावै ॥
दो० करणी सों करतारही, धरा ब्रह्म का नावँ ।
माया भी तौ उन करी, खेली बहु विधि दावँ ॥
कोई निराकार बतलावै । कोई निर्गुण कहि समझावै ॥
कोइ कहै दोनों से न्यारा । है जु अकर्त्ता अलख^६ अपारा ॥
कहैं कि माया कियो पसारा । जेता दीखै यह संसारा ॥
तौ कहु माया कितसों आई । अन्त यही हरिने उपजाई ॥
वही सृष्टि का कारण काजा । वाने जगत प्यारकरि साजा ॥
देह देह में वह दरशावै । चतुर हो चतुराई पावै ॥
जैसे बरतन गढ़ै कुम्हारा । सव में दीखै सिरजनहारा^७ ॥
चित्र^८ मध्य चित्रामी सूझै । सुरति लगाय लगाय उरूझै ॥
जवहीँ बनी वनाई नीकै । कहि शुकदेवजु अपने जीकै ॥
१ ब्रह्मा विष्णु महेश २ रजोगुण ब्रह्मा ३ तमोगुण शिव ४ सतोगुण विष्णु
५ अंदाज ६ न देखपड़नेवाला ७ बनानेवाला ८ तस्वीर ॥
धर्मजहाजवर्णन । ५१
दो० बिना किये कछु होयना, आपहि लेहु विचार ।
करणी देखी दूर लों, शोचा वारंवार ॥
चरणदास तोसों कहौं, उठि उद्यम को लाग ।
आलस सकल गवांयकै, विषयन² में मतिपाग ॥
कारज लोक प्रलोक के, विन करणी हो नाहिं ।
करणी ही सों होतहैं, करणी सबके माहिं ॥
खोटे कर्म्मन सों दुखी, या दुनिया के बीच ।
करणी ही सों होतहै, नर ऊंचा अरु नीच ॥
संगति मिलि करने लगे, ऊंचे नीचे कर्म्म ।
बुद्धि मैली जो होति है, खोवै अपना धर्म्म ॥
सतसंगति सों रहत है, धर्म्म कुसंगति जाय ।
चरणदास शुकदेव कहि, दोनों दिये दिखाय ॥
धर्म गया जब सत गया, भ्रष्ट भई अति बुद्धि ।
तबहिं पाप अरु पुण्यकी, कछू रही ना शुद्धि ॥
पाप पुण्यही सत्य है, ठहरि रहा ब्रह्माण्ड ।
इन दोनों के मिटतही, होत खण्डहू खण्ड ॥
पाप पुण्य व्यवहार है, ताहि देखि प्रत्यक्ष ।
जाही सेती प्रेत यम, देवत गण अरु यक्ष ॥
चौरासी अरु पुरुष सब, चंद सूर³ लौं जान ।
पाप पुण्य के फेर में, सबही पड़े पिछान ॥
पाप किये नरकै पड़े, पावै दुःख अपार ।
पुण्य किये सुख बहुत है, देखो दृष्टि उघार ॥
विरले जन को होत है, पाप पुण्य की सूझ ।
सोइ छुटै जग जाल सों, बहुतै रहै अरूझ ॥
१द्वन्ध २ काम क्रोध लोभ मोह मद मात्सर्य ३ सूर्य ॥
५२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
लक्ष बात की बात है, कोटि बात की जान ।
पाप पुण्य सों जानिये, लाभ होय कै हान ॥
करणी बिन थोथा रहै, कछू न पावै भेव ।
विभव प्राप्त कहुँ होयना, कहैं जु यों शुकदेव ॥
होनी कहैं जु वेभी सारे । करणी करते दृष्टि निहारे ॥
बिन करणी व्यवहार न चालै । नहीं तौ बैठे रहजा ठालै ॥
कृत्य करै सो भी यह करणी । बनिया हाट पांडिया वरणी ॥
करणीही सों खावै पीवै । योग करै बहुतै दिन जीवै ॥
मन मांजै सबही परकाशै । करणीबिन झूठी सब आशै ॥
करणीही सों सिधि द्वै जावै । अष्टसिद्धि करणी सों पावै ॥
जीवन्मुक्ती करणी हेती । सुनिले सकल शास्त्र१ सों तेती ॥
गुरु सों निश्चय यहै जु कीनी । रणजोता मैं तुम को दीनी ॥
दो० यह तौ धर्म जहाज है, मैं तोहिं दई निहार ।
भवसागर मों डारियो, चढ़ै सो उतरै पार ॥
बादवान पुनि खेइयो, दीजो ताहि चलाय ।
पानी पाप निकासियो, नेकहु ना भरिजाय ॥
चढ़ि उतरै जो पारही, पावै सुख का धाम ।
आनँदही आनँद लहै, करै तहां विश्राम ॥
शिष्यवचन ॥
दो० धन्य श्रीशुकदेव हो, वचन तुम्हारे धन्य ।
सब संदेह मिटाय करि, निश्चल कीन्हो मन्य ॥
व्यास पुत्र तुम मम गुरु देवा । करूं मान२सी तुम्हरी सेवा ॥
मन में तुम्हरी पूजा साजू । तुमसों पूंछ करौं सब काजू ॥
मेरे ध्यान शिताबो आये । जो थे सो सन्देह मिटाये ॥
१ सांख्ययोग मीमांसा न्याय वैशेषिक धर्मशास्त्र २ जो मन में की जाय ॥
धर्मजहाजवर्णन । ५३
मैं तौ ध्यान करतही रहूँ। तुम्हरी मूरति हिरदय गहूँ ॥
मेरे जीवन प्राण अधारा । मैं नहिं रहौं चरण से न्यारा ॥
तुम्हरो चरणन दास कहाऊं । वार वार तुम पै बलि जाऊं ॥
तुम्हीं को ईश्वर करि मानूं । पारब्रह्म तुम्हीं को जानूं ॥
और न कोई दूजी आसा । मो हिरदय में राखौ वासा ॥
दो० अपने चरणहिं दास को, सब विधि दिया अघाय ।
स्तुतिकरूं तौ क्या करूं, मोपै कही न जाय ॥
इति श्रीगुरुचेलेका संवादधर्मजहाजसम्पूर्णम् ३ ॥
अथ श्रीगुरुशिष्यसंवादअष्टाङ्ग
योग प्रारम्भः ॥
शिष्यवचन ॥
दो० व्यासपुत्रधनिधनि तुम्हीं, धनि धनि यह अस्थान ।
मम आशा पूरी करी, धनिधनि वह भगवान ॥
तुम दर्शन दुरलभ महा, भये जु मोको आज ।
चरण लगो आपादियो, भये जु पूरण काज ॥
चरणदास अपनोकियो, चरणन लियो लगाय ।
शिरकरधरिसबकछुदियो, भक्तिदई समुझाय ॥
बालपने दरशन दिये, तबहीं सब कछु दीन ।
बीज जु वोया भक्तिका, अब भया वृक्ष नवीन ॥
दिन दिन बढ़ता जायगा, तुम किरपा के नीर ।
जबलगमाली ना मिला, तवलग हुता अधीर ॥
अरु समुझाये योगही, बहु भांती बहु अंग ।
५४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ऊरधरेता ही कही, जीतन बिंद अनंग ॥
अरु आसन सिखलाइया, तिनकी सारी विद्धि ।
तुम्हरी कृपा सों होहिंगे, सबही साधन सिद्धि ॥
इक अभिलाषा और है, कहि न सकूं सकुचाय ।
हिये उठे मुख आयकरि, फिरि उलटी ही जाय ॥
गुरुवचन ॥
दो० सतगुरु से नहिं सकुचिये, एहो चरणहि दास ।
जो अभिलाषा मन विषे, खोलि कहौ अब तास ॥
शिष्यवचन ॥
सतगुरु तुम आज्ञादई, कहूँ अपनी बात ।
योगअष्टांग बुझाइये, जाते हियो सिरात ॥
मोहिं योग बतलाइये, जोहै वह अष्टांग ।
रहनीगहनी विधिसहित, जाके आठो आंग ॥
मत मारग देखे घने, ह्यांसियरे भये प्रान ।
जो कुछ चाहौ तुम करौ, मैं हौं निपट अयान ॥
गुरुवचन ॥
योगअष्टांग बुझाइहैं, भिन्न भिन्न सब अंग ।
पहिले संयम सीखिये, जाते होय न भंग ॥
शिष्यवचन ॥
संयम काको कहतहैं, कहौ गुरू शुकदेव ।
सो सबही समुझाइये, ताको पावै भेव ।
गुरुवचन ॥
प्रथम सूक्ष्म भोजन खावै । क्षुधामिटै नहिं आलस आवै ॥
१ यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा, समाधि ये
अष्टांगयोग कहलाते हैं ।
अष्टाङ्गयोगवर्णन । ५५
थोड़ासा जल पीवन लीजै । सूक्ष्म बोलै वाद न कीजै ॥
बहुत नींद भर सोवै नाहीं । दूजा पुरुष न राखै पाहीं ॥
खट्टा चरपरा खार न खावै । बीरज क्षीण होन नहिं पावै ॥
करै न काहू वैरी मीता । जगवस्तुकी रखे न चीता ॥
निश्चल द्वै मनको ठहरावै । इन्द्रिनके रस सब बिसरावै ॥
तिरया तेल नहिं देह छुवावै । अष्ट सुगन्ध¹ अंग नहिं लावै ॥
पुरुषन की राखै नहि आसा । गुरुका रहै चरणही दासा ॥
दो० काम क्रोध मद लोभ अरु, राखैना अभिमान ।
रहै दीनताई लिये, लगै न माया वान ॥
छल नहिं करै न छल में आवै । दम्भ² झूठके निकट न जावै ॥
टोना यंत्र भूत नहिं ध्यावै । झूठ जानके सब बिसरावै ॥
धातु रसायनि मन नहिं लीजै । झूठ जानि याहू तजिदीजै ॥
स्वांग तमाशे बाग न जैये । आसन ऊपर बैठा रहिये ॥
दृढ़ ह्वै लगै युक्तिके माहीं । ताते विघ्न होय कछु नाहीं ॥
रूठा रहै जगत लोगन सों । न्यारा रहै सबही भोगन सों ॥
इन्द्र आदि लौं सुख संसारी । नेक न चाहै चित्त मँझारी ॥
सिमिटि रहै हिय माहिं समावै । ऐसे योग सधै सिधि पावै ॥
दो० ऋद्धि सिद्धि अरु कामना, तिनकी रखै न आस ।
मान बड़ाई चपलता, त्यागै चरणहिं दास ॥
गहि संतोप क्षमा हिय धारै । संयम करिकरि रोग निवारै ॥
अहङ्कारको छोटा करिये । कुटिल मनोरथमन नहिं धरिये ॥
बसिये जितहि देश सुस्थाना । निर उपाधि धरती अस्थाना ॥
भली भूमि लखि गुफा बनावै । नीची ऊंची रहन न पावै ॥
१ तेल, फुलेल, चोवा, चन्दन, कपूर, इत्र, केसरि, कस्तूरी ये अष्ट सुगन्ध
कहलाते हैं २ मिथ्या बातें बनाना ॥
६
५६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
जिमीं बराबर चौरस होई । होय लदाव कि मधरी सोई ॥
साँकर द्वार कपाट लगावै । कहूँ छिद्र रहने नहिं पावै ॥
तामें बैठि योग तप कीजै । दूजो पुरुष न भीतर लीजै ॥
कहि शुकदेव चरणहीं दासा । जगसों रहिये सदा उदासा ॥
दो० यह सब निश्चयही करै, योग युक्ति के साथ ।
पहिले ऐसा होय करि, पीछे साधन साध ॥
आठ अंग कहुं योगके, सुनो चरणहीं दास ।
मेरे बचनन के विषे, चितदै करौ निवास ॥
यमके अंग प्रथम सुनि लीजै । दूजे नियम कहूँ चित दीजै ॥
तीजे आसन हितकरि साधौ । प्राणायाम चौथे आराधौ ॥
प्रत्याहार पांचवां जानौ । छठे धारणा को पहिंचानौ ॥
सतवें ध्यान मिटै सब बाधा । कहूँ आठवां अंग समाधा ॥
शिष्यवचन ॥
धन्य धन्य तुम श्री गुरुदेवा । मेरे प्राणनाथ शुकदेवा ॥
व्यास पुत्र तुम दीन दयाला । मम अनाथ को कियो निहाला ॥
आठ अंग मोहिं दिये सुनाई । अब कहु भिन्न भिन्न समुझाई ॥
एक एकको जुदा बखानो । जासों जाय दास पर जानो ॥
गुरुवचन
दो० एक एक का कहतहौं, जुदा जुदा विस्तार ।
श्रवणन सुनौ विचारिकै, लेलै हियमें धार ॥
अथ यमअंग वर्णन
प्रथम कहौं यम के दश अंगा³ । समझैं योग न होवै भंगा ॥
१ कँवारा २ प्राण अपान व्यान उदान समान ३ अहिंसा, सत्यदृढ़ असत्-
त्याग, ब्रह्मचर्य धरना, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद मात्सर्य, तृष्णा इनसे पृथक्
रहना, क्षमा, धैर्य, दया, आर्जव, मिताहार यानी सूक्ष्म भोजन करना ये यमके
दश अंग कहलाते हैं ॥
अष्टाङ्गयोगवर्णन । ५७
प्रथम अहिंसाही सुन लीजै । मनकरि काहू दोष न कीजै ॥
कड़ुवा वचन कठोर न कहिये । जीवघात तनसों नहिं दहिये ॥
तन मन वचन न कर्म लगावै । यही अहिंसाधर्म कहावै ॥
दूजे सत्य सत्यही बोले । हिरदै तौलि वचन मुख खोलै ॥
तीजे असते त्याग सुनीजै । तनमन सों कछु नाहिं हरीजै ॥
तन चोरी के लक्षण नाखै । मनकी चोरी को नहिं राखै ॥
चौथा ब्रह्मचर्य बतलाऊं । भिन्न भिन्न करि ताहि सुनाऊं ॥
दो० ब्रह्मचर्य यासों कहैं, सुनहु चरणही दास ।
आठ अंगैं सो नारिकी, नेक न राखै आस ॥
यती होय दृढ़ काँछ गहीजै । वीर्य क्षीण नहिं होने दीजै ॥
मैथुन कहूँ अष्ट परकारा । ब्रह्मचर्य रहै इनसे न्यारा ॥
सुमिरणतियाको नहि करिये । श्रवणनसुरति रूप नहिं धरिये ॥
रस शृंगार पढ़े नहिं गावै । नारिनसों नहिं हँसै हँसावै ॥
दृष्टि न देखे विष नहिं दौरै । मुख देखै मन होजा औरै ॥
बात इकन्त करै नहिं कबहीं । मिलन उपाय जुत्यागै सबहीं ॥
स्पर्शअष्टम निकट न जावै । कामजीति योगी सुखपावै ॥
अष्टप्रकारके मैथुन जानों । इन्हें तजे ब्रह्मचर्य पिछानों ॥
कहैं शुकदेव चरणहीदासा । ब्रह्म सत्य में करै निवासा ॥
दो० पँचवीं सुखदाई क्षमा, जलन बुझावै सोय ।
जोटुक आवै घटविषे, पातक डारै खोय ॥
१ विद्या पढ़ना व्रत करना नित्यकर्म संध्यावन्दनादि करना भिक्षा मांगि
कर भोजन बनाय गुरु को नैवेद्य लगाय भोजन करना इसे ‘ब्रह्मचर्य कहते
हैं २ स्मरण, सुरति, शृङ्गारावलोकन, हास्य करना, दृष्टि सों त्रिया रूप
देखना, मिलन उपाय, स्पर्श, एकान्त में वार्त्तालाप करना ये अष्टाङ्ग विषय
के कहलाते हैं ॥
५८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
कोई दुष्ट कछू कहिजावो । गाली देकर कोइ खिझावो ॥
कै कोइ शिरपर कूड़ा डारो । कै कोइ दुखदेबो अरु मारो ॥
बाकी कछू न मनमें लावै । उलटा उनको शीश नवावै ॥
ऐसी क्षमा हिये में लावो । बोलौ शीतल अग्नि बुझावो ॥
छठाँ अंग धीरज का जानौ । धीरजही हिरदय में आनौ ॥
योगयुक्ति धीरज सों कीजै । सब कारज धीरज सों लीजै ॥
धीरज सों बैठै अरु डोलै । धीरज राखि समुझिकर बोलै ॥
आनि परै दुख ना अकुलावै । धीरज सों दृढ़ता गहिलावै ॥
दो० धीरज रहा तौ सब रहा, काहूसे न डराय ।
सिंह प्रेत अरु कालका, धीरज सों डरजाय ॥
दया सातवीं अब सुनि लीजै । सब जीवन की रक्षा कीजै ॥
लख चौरासी का सुखदाई । सबके हित की कहै बनाई ॥
रहिये तन मन बचन दयाला । सबही सों निर्वैर कृपाला ॥
अठवै कहूँ आर्य्यवै खोलै । कोमलहृदय सों कोमलबोलै ॥
सबको कोमल दृष्टि निहारै । कोमलता तन मन में धारै ॥
कोमल धरती बीज बवावै । बढ़े बेगि फूलै फल लावै ॥
ऐसे कोमल हिया बनावै । योग सिद्धि करि पद पहुँचावै ॥
यही आर्य्यव लक्षण जानो । शुकदेवकहैं रणजीतपिछानो ॥
दो० मिताहार जो नवें की, समझ लेहु मनमाहि ।
सतगुन भोजन खाइये, ऐसा वैसा नाहिं ॥
खावै अन्न विचारिकै, खोंटा खरा सँभार ।
जैसाही मन होत है, तैसा करै अहार ॥
सूक्ष्म चिकना हलका खावै । चौथाभाग छोड़ि करि पावै ॥
वानप्रस्थ कै हो संन्यासै । भोजन सोलह ग्रास गिरासै ॥
अरु गृहस्थ बत्तीस गिरासा । आव नींद न बहुत न श्वासा ॥
अष्टाङ्गयोगवर्णन । ५६
ब्रह्मचारी भोजन करै इतना । पठनमाहिँबीरजरहै जितना ॥
दशवां शौच पबित्तर रहिये । कर दातौन हमेश नहइये ॥
जो शरीर में होवै रोगा । रहै न तन जल छूवन योगा ॥
तौ तन माटी से शुधि कीजै । अबअंतरकी शुधि सुनलीजै ॥
राग द्वेष हिरदय सों टारै । मन सों खोटे कर्म निवारै ॥
दो० दशप्रकारका कहा यह, पहिल योगकी नीव ।
नेम कहूं अब - दूसरा, सो है साधन सीव ॥
अथ नेमअंगवर्णन ॥
दूजा अंग नियम का गाऊं । भिन्न भिन्न सब अंग सुनाऊं ॥
पहला तप इन्द्री वश कीजै । इनके स्वाद सभी तजि दीजै ॥
खातें पीतैं सोवत जागत । योगी इन्द्रिन कूं वश राखत ॥
तनकूं वश कर मनकूं मारै । ऐसी विधि तपका अँगधारै ॥
दूजा अंग कहूं संतोषा । हानि भये नहिं माने शोका ॥
लाभ भये नाहीं हरषावै । ऐसी समझ हिये में लावै ॥
परारब्ध तन होय सु होई । सँकलप बिकलपरखैनकोई ॥
दो० तीजा आस्तिक अंग है, जाका सुनो विचार ।
समझ समझ मनमें धरो, ताको गहो संभार ॥
शास्त्र सुने परतीत जो कीजै । सत्तब्रह्म निश्चय करिलीजै ॥
बुध निश्चय आतम के माहीं । जगत सांच करि मानै नाहीं ॥
चौथा दान अंग विधि होई । पात्र कुपात्र विचारै सोई ॥
एक दान उपदेश जु दीजै । भवसागर सों पार करीजै ॥
दूजा दान अन्न अरु पानी । दीजै कीजै बहु सनमानी ॥
१ इन्द्रियवश, संतोप, आस्तिक, शास्त्रचिंतन, दान देना, ईश्वराराधन,
सिद्धांतश्रवण, लाजयुक्त, तत्त्वदृद, जाप ये दशअंग नियमके कहलाते हैं ॥
६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
और पराये दुख की बूझै । सुखदानी परमारथ सूझै ॥
पंचम ईश्वर पूजा करिये । तन मन बुद्धि जहांलै धरिये ॥
है निष्काम तजै सब आसा । सेवा करै होय निजदासा ॥
दो० पान फूल जु भाव सों, सह सुगन्ध करि धूप ।
शुकदेव कहैं यों कीजिये, पूजा अधिक अनूप ॥
छठें सिद्धान्त श्रवण सुन बानी । करि विचार गहिये मनमानी ॥
सार असार विचार जु कीजै । पानीको तजि पयको पीजै ॥
अरु सतगुरुसों निश्चय करिये । परखि सँभारि हिये में धरिये ॥
करणी करै तिन्हों से मिलना । वचन अयोगी के नहिं सुनना ॥
सतवां वही जु कहिये लाजा । सो वह सकल सँवारन काजा ॥
साधु गुरूंसें लाज कीजै । तन मन डोलन नाहीं दीजै ॥
करम विपर्यय सब परिहरिये । हिय आंखिन में लज्जा भरिये ॥
शुकदेवकहै सुनिचरणहिंदासा । लज्जा भवन माहिं करि बासा ॥
दो० कुटुंब मित्र जग लोगही, सबसूं कीजै लाज ।
बड़ी लाज हरिसूं करो, नीके सुधरै काज ॥
अष्टम हूँ मति दृढ़ जो कहिये । सो विशेष साधनकूं चहिये ॥
शुभ करमनकी इच्छा करनी । हो न सकै तौ भी हिय धरनी ॥
बहँकै ना काहू बहँकाये । कैसेहू नहिं हलै हलाये ॥
जग सुख देखि न मनमें आनै । स्वर्गआदि सुख तुच्छहिजानै ॥
कोइ अस्तुति आदर करि सेवै । कोइ कुभाव करि गाली देवै ॥
दोनों में निश्चल रहै जोई । शुकदेव कहैं दृढ़मति है सोई ॥
नवयें जाप करै गहि मौना । मन जिह्वासूं कीजै जौना ॥
होयसकै मन पवन गहीजै । गुरुमन्तर जप तामें कीजै ॥
दो० हरिगुरुकी अस्तुति पढ़ै, सो भी कहिये जाप ।
शुकदेव कहैं रणजीतसुनि, त्रैविधि नाश ताप ॥
अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६१
दर्शवं समझौ होमही, कीजै दोय प्रकार ।
अँगन माहिं साकिल्ल कूं, वेद कहै ज्यों डार ॥
दूजै पावक ज्ञानकी, तामें इन्द्री होम ।
वाकूं परगट भूमि है, याकूं हिरदा भौम ॥
यमका अंग सभी कह दीन्हा । नेम कहा सोभी तुम चीन्हा ॥
निरैयोगही के मतजानौ । सबके कारज को पहिचानौ ॥
औपै योग पहल ये चहिये । शुभकरमन के मारग गहिये ॥
जोये होय तौ होवै योग । नाहीं बहै जगत के भोग ॥
जज्ञासीकूं पहल सुनीजै । पाछे भेद योगको दीजै ॥
यम अरु नियम दोऊ बतलाये । अच्छी नीकी भांति सुनाये ॥
अब तीजै आसन समझाऊं । जुदे जुदे कहि सबै सुनाऊं ॥
योग पहिल आसनही साधै । आसनविना योग बरबादै ॥
अथ आसनवर्णन ॥
दो० चरणदास निश्चय करौ, बिन आसन नहिं योग ।
जो आसन दृढ़ होय तो, योग सधै भजि रोग ॥
चौरासीलख आसन जानौ । योनिनकी बैठक पहिचानौ ॥
तिनमें चौरासी चुग लीन्हें । दुरलभ भेद सुगम सों कीन्हें ॥
सो तुमकूं पहिले बतलाये । जिनकूं साधौगे चितलाये ॥
तिनमें दोय अधिक परधा२नैं । तिनकूं सब योगेश्वर जानैं ॥
आसनसिद्ध पदम कहलावै । इनकूं करि निश्चय ठहरावै ॥
अरु आसन सब रोग भजावैं । ये दो आसन योग सधावैं ॥
इन कूं साधै जो जन कोई । ध्यान समाधि लगावै सोई ॥
१ नवलक्ष जलचर, दशलक्ष नभचर, ग्यारहलक्ष कृमि, बारहलक्ष वनचर,
चारिलक्ष मनुष्य, तीसकक्ष पशुयोनि इत्यादि चौरासीलक्ष योनि हैं २ मुख्य ॥
६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरणदास शुकदेव कहैं यों। आसन दोनों बरणौं हैं ज्यों ॥
अथ पद्मासनविधि ॥
पहिले आसन पदम बताऊं। ज्यों की त्यों मूरति दिखलाऊं ॥
पहिले बावां पांव उठावै। दहिनी जङ्घा ऊपर लावै ॥
दहिना पांव फेरि यों लावै। बांवीं साथल ऊपर राखै ॥
बावां कर पीछे सों लावै। बाम अँगूठा गहि तन तावै ॥
ऐसे हाथ दाहिना लावै। दहिन अँगूठा पकड़ दृढ़ावै ॥
ग्रीवालटक चिबुक हिये आवै। नासा आगे दीठि लगावै ॥
दिव्यदृष्टि हो कौतुक दरशै। कहै शुकदेव अभैपद परशै ॥
दो० कै हिरदै राखै चिबुक, कै सम राखै देह।
कै घौटों दोउ हाथ रखि, कै अँगूठा गहिलेह ॥
अथ सिद्धासनविधि ॥
दूजा आसनसिद्ध जुकीजे। बावां पांव गुदाढिग दीजै ॥
दाहिन पांव लिंगपर आवै। दृष्टि सुभ्रुकुटी पै ठहरावै ॥
अचरज जहां अधिक दरशावै। खुले कपाट मोक्ष गति पावै ॥
आसन साधि व्याधि परिहरै। भूख नींद जोपै वश करै ॥
दो० एड़ी पावै पांव की, सीवन मध्ये राख।
लिंग गुदा के मध्य में, मूल बोलिये साख ॥
संयम सूं इन्द्री गहै, राखै सरल शरीर।
दृष्टि उठा भ्रुकुटी धरै, मिटै जु दोनों पीर ॥
दहिनी लावै लिंगपर, भाग बराबर राखि।
बारी बारी कीजिये, शुकदेवा कहै भाखि ॥
अथ प्राणायामअंग वर्णन ॥
चौथे प्राणायामही, कहूँ सुनौ चित लाय।
जाबल जीवै पनकुं, चढ़ै गगन कूं धाय ॥
अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६३
षटचक्कर कूं छेदि करि, सुखमनही की राह।
दलसहस्रके कमल में, पहुँचै करै उछाह ॥
हिरदै में अस्थान है, प्रान वायु का - जान ।
वाके रोंके सबरुकैं, वायुन में परधान ॥
जैसे गंगा एकही, घाट घाट के नावँ ।
ऐसे प्राणहि वायु के, नावँ कहे बहु ठावँ ॥
चौरासी अस्थान' पर, चौरासीही वायु।
तामें दश ये मुख्य हैं, बरणौं सुनिये ताय ॥
प्राण अपान समानही, और व्यान , उद्यान ।
नाम धनंजय देवदत, कूरम किरकल जान ॥
दशवायू जो एकही, तिनमें दीरघ दोय ।
सोवै प्राण अपानहैं, तिन्हें पिछानै कोय ॥
प्राणजाय प्राणैं मिलै, रहे प्राणके प्रान।
शुकदेव कहि वर्णन करूं, अब इनके अस्थान ॥
प्राणवायु हिरदै के ठाहीं। बसै अपान गुदा के माहीं ॥
वायु समान नाभि अस्थाना । कंठ माहिं बाई उद्याना ॥
व्यान जुव्यापक है तन सारै । नाग वायु सों उठै डकारै ॥
पलक उघाड़ै कूरमबाई । देवदत्तसूं होय जँभाई ॥
किरकल वायु जु भूख लगावै । मुखै धनंजय देह फुलावै ॥
सब में प्राण वायु मुखजानौं । सो हिरदै के मध्य पिछानौं ॥
हिरदाही, देही के माहीं । जो कुछ है सो झांही झांही ॥
योगेश्वर ह्यांईं फल पावैं । ह्यांसू अनहद नाद जगावै ॥
६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ चक्रवर्णन ॥
दो० अब चक्र¹ बरनन करूं, पाछे प्राणायाम ।
बरणूं नारी सुषमना, सुधरै सबही काम ॥
हैं वे सूरति कमल की, छोटे और विशाल ।
मूलसुं लेकर शीशलौं, एकहि जिनकी नाल ॥
कुं० लालरंग पहिला कहूँ चक्रधार तिहि नाँवँ ।
चार पँखरी² तासु की हैं जु गुदा के ठावँ ॥
हैं जु गुदा के ठावँ देह तांही पर राजै ।
चारों अक्षर तहाँ देव गन्नेश विराजै ॥
पवन सुरत हां लैधरै खोलि कहैं शुकदेव ।
दूजा लिंगस्थानही जाको सुन अब भेव ॥
पीतबरण षट पँखरी नामजु स्वाधिष्ठान ।
षट अक्षर जापै दिये ब्रह्मा दैवत जान ॥
ब्रह्मा दैवत जान सँग सावित्री³ दासा ।
इन्द्र सहित सब देव तहां सबही का बासा ॥
मणिपूरक चक्र कहूं तीजा नाभि स्थान ।
नीलबरण दश पँखरी दश अक्षर परमान ॥
दो० विष्णु जहांका देवता, महालक्ष्मी संग ।
चरणदास अब कहतहूँ, चौथे को परसंग ॥
अनहदचक्र हिरदयबिषे, द्वादशदल अरुश्वेत ।
शिवशक्ती⁴ जहाँ देवता, द्वादश अक्षर भेद ॥
पँचवां चक्र कंठ में, विशुद्ध नामजिहिकेर ।
१ आधार,स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनहद, विशुद्ध, आज्ञा ये छः चक्र
शरीर के अन्तर रहते हैं २ पंखुरी ३ सरस्वती ४ पार्वती ॥