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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 91

५६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
जिमीं बराबर चौरस होई । होय लदाव कि मधरी सोई ॥
साँकर द्वार कपाट लगावै । कहूँ छिद्र रहने नहिं पावै ॥
तामें बैठि योग तप कीजै । दूजो पुरुष न भीतर लीजै ॥
कहि शुकदेव चरणहीं दासा । जगसों रहिये सदा उदासा ॥
दो० यह सब निश्चयही करै, योग युक्ति के साथ ।
पहिले ऐसा होय करि, पीछे साधन साध ॥
आठ अंग कहुं योगके, सुनो चरणहीं दास ।
मेरे बचनन के विषे, चितदै करौ निवास ॥
यमके अंग प्रथम सुनि लीजै । दूजे नियम कहूँ चित दीजै ॥
तीजे आसन हितकरि साधौ । प्राणायाम चौथे आराधौ ॥
प्रत्याहार पांचवां जानौ । छठे धारणा को पहिंचानौ ॥
सतवें ध्यान मिटै सब बाधा । कहूँ आठवां अंग समाधा ॥
शिष्यवचन ॥
धन्य धन्य तुम श्री गुरुदेवा । मेरे प्राणनाथ शुकदेवा ॥
व्यास पुत्र तुम दीन दयाला । मम अनाथ को कियो निहाला ॥
आठ अंग मोहिं दिये सुनाई । अब कहु भिन्न भिन्न समुझाई ॥
एक एकको जुदा बखानो । जासों जाय दास पर जानो ॥
गुरुवचन
दो० एक एक का कहतहौं, जुदा जुदा विस्तार ।
श्रवणन सुनौ विचारिकै, लेलै हियमें धार ॥
अथ यमअंग वर्णन
प्रथम कहौं यम के दश अंगा³ । समझैं योग न होवै भंगा ॥
१ कँवारा २ प्राण अपान व्यान उदान समान ३ अहिंसा, सत्यदृढ़ असत्-
त्याग, ब्रह्मचर्य धरना, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद मात्सर्य, तृष्णा इनसे पृथक्
रहना, क्षमा, धैर्य, दया, आर्जव, मिताहार यानी सूक्ष्म भोजन करना ये यमके
दश अंग कहलाते हैं ॥