भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधर्मजहाजवर्णन । ४५
ऐसे रहि शुभ कर्म्म जु करें । सदा मौत से सब जन डरें ॥
सहज सहज फिरि वहदिन आया। डरे नहीं शुभकर्म्म कमाया ॥
आपसमें कहें हमको क्या है। यमकी मार नरक भय नाहै ॥
राजा जान्यो वह दिन आया। अपना सेवक तुरत पठाया ॥
कही कि फौज सबै वनि आवैं । कतल करन परजा को धावैं ॥
फौजें सजिकरि ठाढ़ी भईं । आज्ञा ओर दृष्टि जो दई ॥
राजाके मन ऐसी आई । उन सब पुरुपन लेहुँ बुलाई ॥
सांचे सबही के इतवारी । फेरि बुलावो अवकी वारी ॥
यही शोचि फिरि शीश उठाया। आज्ञाकारी निकट बुलाया ॥
दो० कामदार सों यों कही, वैसो पुरुप बुलाय ।
जिनमें मिलिवैठा प्रथम, हरिसों ध्यान लगाय ॥
फिरि उनहिंन को लियो बुलाई। मिलि बैठा सबका सुखदाई ॥
कहीकि सब मिलि सुरति उठावो। रामओर को ध्यान लगावो ॥
अज्ञा होय सोइ तुम मानौ । मेरा दोप कछू मत जानौ ॥
मोको अज्ञा होय सो करिहौं। अपने हिये नेकनहिं धरिहौं ॥
राजा कहि मिलि ध्यान लगाया। ऐसा शब्द गगनसों आया ॥
राजा मैं अब बकसि दियाहै। सकल प्रजाको शुद्ध हियाहै ॥
जिन पर मोको कोप भया था। तिनके कारण खड्ग लियाथा ॥
सर्व प्रजा सो वातें डारी। करिसुकर्म हरिभक्ति सँभारी ॥
दो० ताते अज्ञा यों दई, रचो कुटुँव घरवार ।
शुभकर्म्मन को कीजिये, खोटे कर्म्म निवार ॥
राजाकही खोलि दृग दीजै। अज्ञाभई सोई अब कीजै ॥
खोलि आँख कर जोरिके भाखे। बकसे गये तुम्हारे राखे ॥
जो तुम कहौ सोई अब करें। बचन तुम्हारे हिरदय धरें ॥
राजा कही यही तुम कीजो। रामनामको संगी लीजो ॥