भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधर्मजहाजवर्णन । ५३
मैं तौ ध्यान करतही रहूँ। तुम्हरी मूरति हिरदय गहूँ ॥
मेरे जीवन प्राण अधारा । मैं नहिं रहौं चरण से न्यारा ॥
तुम्हरो चरणन दास कहाऊं । वार वार तुम पै बलि जाऊं ॥
तुम्हीं को ईश्वर करि मानूं । पारब्रह्म तुम्हीं को जानूं ॥
और न कोई दूजी आसा । मो हिरदय में राखौ वासा ॥
दो० अपने चरणहिं दास को, सब विधि दिया अघाय ।
स्तुतिकरूं तौ क्या करूं, मोपै कही न जाय ॥
इति श्रीगुरुचेलेका संवादधर्मजहाजसम्पूर्णम् ३ ॥
अथ श्रीगुरुशिष्यसंवादअष्टाङ्ग
योग प्रारम्भः ॥
शिष्यवचन ॥
दो० व्यासपुत्रधनिधनि तुम्हीं, धनि धनि यह अस्थान ।
मम आशा पूरी करी, धनिधनि वह भगवान ॥
तुम दर्शन दुरलभ महा, भये जु मोको आज ।
चरण लगो आपादियो, भये जु पूरण काज ॥
चरणदास अपनोकियो, चरणन लियो लगाय ।
शिरकरधरिसबकछुदियो, भक्तिदई समुझाय ॥
बालपने दरशन दिये, तबहीं सब कछु दीन ।
बीज जु वोया भक्तिका, अब भया वृक्ष नवीन ॥
दिन दिन बढ़ता जायगा, तुम किरपा के नीर ।
जबलगमाली ना मिला, तवलग हुता अधीर ॥
अरु समुझाये योगही, बहु भांती बहु अंग ।