भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधर्मजहाजवर्णन । ४७
तेज मुल्कमें होवै भारी । हुकुम जुमानैं नर अरु नारी ॥
और एक ऐसे उठि बोला । सावधान ह्वै अन्तर खोला ॥
दो० राजाही का हुकम तो, थोरेही में जोय ।
ऐसी करणी कीजिये, भूपचक्रवै होय ॥
एकद्वीप नौखण्ड में, जाको पूरो राज ।
एक और उठि बोलिया, यह भी ओछा साज ॥
चक्रवर्त्ति१ में इन्द्र बड़, देवन हूँ को भूप ।
उम्र बड़ी आनंद बड़े, दुख की लगै न धूप ॥
करणी करत इन्द्रही लोगा । होकर राजा कीजै भोगा ॥
जहाँ अप्सरा नृत्य करत हैं । सुन्दर अधिकी रूप धरत हैं ॥
और बड़ा भाई यों भाखा । सुरपतिहूको नाहीं राखा ॥
कहा कि पदवी ब्रह्माकीसी । और न दीखै काहू हीसी ॥
जाके एक दिवसही माहीं । चौदह इन्द्र सर्व ह्वै जाहीं ॥
सब ब्रह्मण्ड आसरे वाके । बिनशिजायँ मिटिजायँ जाके ॥
तीनि लोकका पिता वही है । वेद पुराणन माहँ कही है ॥
करणी करिकरि ब्रह्मा हूजै । ऐसी पदवी क्यों नहिं लीजै ॥
दो० सगरे यों उठि बोलिया, सत्य सत्य यह बात ।
ऐसाही अब कीजिये, ठहराई सब भ्रात ॥
दशहू करन तपंस्या लागे । पारब्रह्मकी ओरी पागे ॥
अधिक तपस्या कीन्ही भारी । मास सूखिगया दीखैं नारी ॥
हाड़ त्वचा२ चिपटी रहगई । लोहू धातु३ कछू ना ठई ॥
सब जन चित्रहिसे रहगये । कठिन तपस्या करते भये ॥
फूलपात जलहू नहिं लीन्हा । ऐसा तप दशहूने कीन्हा ॥
तन त्यागे दूजेही जन्मा । दशहू भ्रात हुये जो ब्रह्मा ॥
१ चारों दिशाओं का राजा २ खाल ३ वीर्य ॥