भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गुरुको ध्यान धरो मनमाहीं । विपति जासुसों आवतनाहीं ॥
अपनी त्रिया त्रियाकरि जानो । परतिरियाको माता मानो ॥
परधन को पाहन १ सम देखो । शुभकर्मनको करो विशेखो ॥
बोलौ सांच झूठको नाखो । निन्दा हिंसा नेक न राखो ॥
है रहियो सबके सुखदाई । करुवा वचन न बोलौ भाई ॥
जो व्यवहार करौ सो सांचा । लोक प्रलोक न आवै आंचा ॥
दो० भाषत श्रीशुकदेवजी, सुनौ चरणही दास ।
राजा ने उपदेश दै, खोई सबकी त्रास ॥
फिरि वै पुरुष बिदा है आये । हरि राजाके वचन सुनाये ॥
जिन बातनसों बकसे सारे । सो रखियो तुम हिये मँझारे ॥
उज्ज्वल कर्म भूलि मति जैयो । हरिकीभक्ति माहिँही रहियो ॥
सुनिकरि आपसमें फैलाई । एक एक ने सुनी सुनाई ॥
सबने मानी निश्चय कीन्ही । प्रकट २ सुअपनी आंखिनं चीन्ही ॥
हाथ कँगनको दर्पण केहा । जैसी करणी भुगतै जेहा ॥
खुशीभये लागे व्यँवहारा । रामभक्तिको लिये सँभारा ॥
कहि शुकदेव चरणहीदासा । सकल प्रजा रहै उमगहुलासा ॥
दो० चरणदास सुनिये श्रवण, मैं उपदेशूं तोहिं ।
जो पहिले हरिको भजै, पाछे दुःख न होहिं ॥
कथा कहौं इक और पुरानी । करणी करै सुसमुझै प्रानी ॥
इन्दुनाम इक ब्राह्मण हुता । जाके दश सुत अरु इक सुता ॥
सुता व्याहि दइ घरकी हुई । जाके पीछे माता मुई ॥
पिता मुवा दश पुत्र रहेथे । आपसमें सब बैठि कहेथे ॥
ऐसी कछू जु करणी कीजै । जगमें ऊंची पदवी लीजै ॥
इकने कही हूजिये भूपा । सुन्दर देही धरौ अनूपा ॥
१ पत्थर २ जाहिर ॥