भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधर्मजहाजवर्णन । ५१
दो० बिना किये कछु होयना, आपहि लेहु विचार ।
करणी देखी दूर लों, शोचा वारंवार ॥
चरणदास तोसों कहौं, उठि उद्यम को लाग ।
आलस सकल गवांयकै, विषयन² में मतिपाग ॥
कारज लोक प्रलोक के, विन करणी हो नाहिं ।
करणी ही सों होतहैं, करणी सबके माहिं ॥
खोटे कर्म्मन सों दुखी, या दुनिया के बीच ।
करणी ही सों होतहै, नर ऊंचा अरु नीच ॥
संगति मिलि करने लगे, ऊंचे नीचे कर्म्म ।
बुद्धि मैली जो होति है, खोवै अपना धर्म्म ॥
सतसंगति सों रहत है, धर्म्म कुसंगति जाय ।
चरणदास शुकदेव कहि, दोनों दिये दिखाय ॥
धर्म गया जब सत गया, भ्रष्ट भई अति बुद्धि ।
तबहिं पाप अरु पुण्यकी, कछू रही ना शुद्धि ॥
पाप पुण्यही सत्य है, ठहरि रहा ब्रह्माण्ड ।
इन दोनों के मिटतही, होत खण्डहू खण्ड ॥
पाप पुण्य व्यवहार है, ताहि देखि प्रत्यक्ष ।
जाही सेती प्रेत यम, देवत गण अरु यक्ष ॥
चौरासी अरु पुरुष सब, चंद सूर³ लौं जान ।
पाप पुण्य के फेर में, सबही पड़े पिछान ॥
पाप किये नरकै पड़े, पावै दुःख अपार ।
पुण्य किये सुख बहुत है, देखो दृष्टि उघार ॥
विरले जन को होत है, पाप पुण्य की सूझ ।
सोइ छुटै जग जाल सों, बहुतै रहै अरूझ ॥
१द्वन्ध २ काम क्रोध लोभ मोह मद मात्सर्य ३ सूर्य ॥