भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जिनके दश ब्रह्माण्ड बने हैं। एकएक तिनमाहिं ठने हैं ॥
करणी कबहुँ न निष्फल जावै । जो मनधारे सोई पावै ॥
दो० करणी सों भये इन्द्रहु, करणी ब्रह्मा सोय ।
करणी सों ईश्वर भये, शुकदेवा कहै गोय ॥
दश हजार इक बीसही, वर्ष तपस्या कीन्ह ।
हरिजाको बदलो दियो, मांगो सो वर दीन्ह ॥
चारौ युगके माहिं जो, करणीही परधान१ ।
गुरु शुकदेवा कहत है, चरणदास उरआन ॥
उज्ज्वल कर्म्मन के कियें, दिनदिन उज्ज्वलहोय ।
मनमें उपजै भक्तिही, प्रेम पदारथ सोय ॥
चरणदास तुम करणी कीजो । याही में मन नीके दीजो ॥
ऐसा जन्म बहुरि नहिं पैहै । बीतिजाय पुनि बहु पछितै हैं ॥
मनुष देह को दुर्लभ जानौ । याको पा शुभकरणी ठानौ ॥
यो देही में करी कमाई । जाय स्वर्ग में नौनिधि पाई ॥
भक्तिकरी देही के माहीं । जा बैकुण्ठ सु आये नाहीं ॥
या देही में ज्ञान भया है । जीव ब्रह्म जो होय गया है ॥
मूरख करणी को नहिं जानै । कथनी कथिकथि बहुत बखानै ॥
थोथी कथनी काम न आवै । थोथा फटकै उड़ि उड़ि जावै ॥
दो० कथनीही के बीचमें, लीजो तत्त्व२ विचार ।
सार सार गहि लीजियो, दीजो डारि असार ॥
थोथी कथनी वही जु जानौ । बिन करणी जो करै बखानौ ॥
लोक प्रलोक न शोभा पावै । बकिबकिबकि खाली रहिजावै॥
कथनी के शूरा बहु जाने । करणी में कायर अरु याने ॥
शूरा वही जु करणी करै । दया धर्म्मलै सन्मुख अरै ॥
१ मुख्य २ पृथ्वी अप् तेज वायु आकाश ॥