भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
लक्ष बात की बात है, कोटि बात की जान ।
पाप पुण्य सों जानिये, लाभ होय कै हान ॥
करणी बिन थोथा रहै, कछू न पावै भेव ।
विभव प्राप्त कहुँ होयना, कहैं जु यों शुकदेव ॥
होनी कहैं जु वेभी सारे । करणी करते दृष्टि निहारे ॥
बिन करणी व्यवहार न चालै । नहीं तौ बैठे रहजा ठालै ॥
कृत्य करै सो भी यह करणी । बनिया हाट पांडिया वरणी ॥
करणीही सों खावै पीवै । योग करै बहुतै दिन जीवै ॥
मन मांजै सबही परकाशै । करणीबिन झूठी सब आशै ॥
करणीही सों सिधि द्वै जावै । अष्टसिद्धि करणी सों पावै ॥
जीवन्मुक्ती करणी हेती । सुनिले सकल शास्त्र१ सों तेती ॥
गुरु सों निश्चय यहै जु कीनी । रणजोता मैं तुम को दीनी ॥
दो० यह तौ धर्म जहाज है, मैं तोहिं दई निहार ।
भवसागर मों डारियो, चढ़ै सो उतरै पार ॥
बादवान पुनि खेइयो, दीजो ताहि चलाय ।
पानी पाप निकासियो, नेकहु ना भरिजाय ॥
चढ़ि उतरै जो पारही, पावै सुख का धाम ।
आनँदही आनँद लहै, करै तहां विश्राम ॥
शिष्यवचन ॥
दो० धन्य श्रीशुकदेव हो, वचन तुम्हारे धन्य ।
सब संदेह मिटाय करि, निश्चल कीन्हो मन्य ॥
व्यास पुत्र तुम मम गुरु देवा । करूं मान२सी तुम्हरी सेवा ॥
मन में तुम्हरी पूजा साजू । तुमसों पूंछ करौं सब काजू ॥
मेरे ध्यान शिताबो आये । जो थे सो सन्देह मिटाये ॥
१ सांख्ययोग मीमांसा न्याय वैशेषिक धर्मशास्त्र २ जो मन में की जाय ॥