भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ऊरधरेता ही कही, जीतन बिंद अनंग ॥
अरु आसन सिखलाइया, तिनकी सारी विद्धि ।
तुम्हरी कृपा सों होहिंगे, सबही साधन सिद्धि ॥
इक अभिलाषा और है, कहि न सकूं सकुचाय ।
हिये उठे मुख आयकरि, फिरि उलटी ही जाय ॥
गुरुवचन ॥
दो० सतगुरु से नहिं सकुचिये, एहो चरणहि दास ।
जो अभिलाषा मन विषे, खोलि कहौ अब तास ॥
शिष्यवचन ॥
सतगुरु तुम आज्ञादई, कहूँ अपनी बात ।
योगअष्टांग बुझाइये, जाते हियो सिरात ॥
मोहिं योग बतलाइये, जोहै वह अष्टांग ।
रहनीगहनी विधिसहित, जाके आठो आंग ॥
मत मारग देखे घने, ह्यांसियरे भये प्रान ।
जो कुछ चाहौ तुम करौ, मैं हौं निपट अयान ॥
गुरुवचन ॥
योगअष्टांग बुझाइहैं, भिन्न भिन्न सब अंग ।
पहिले संयम सीखिये, जाते होय न भंग ॥
शिष्यवचन ॥
संयम काको कहतहैं, कहौ गुरू शुकदेव ।
सो सबही समुझाइये, ताको पावै भेव ।
गुरुवचन ॥
प्रथम सूक्ष्म भोजन खावै । क्षुधामिटै नहिं आलस आवै ॥
१ यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा, समाधि ये
अष्टांगयोग कहलाते हैं ।