भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टाङ्गयोगवर्णन । ५५
थोड़ासा जल पीवन लीजै । सूक्ष्म बोलै वाद न कीजै ॥
बहुत नींद भर सोवै नाहीं । दूजा पुरुष न राखै पाहीं ॥
खट्टा चरपरा खार न खावै । बीरज क्षीण होन नहिं पावै ॥
करै न काहू वैरी मीता । जगवस्तुकी रखे न चीता ॥
निश्चल द्वै मनको ठहरावै । इन्द्रिनके रस सब बिसरावै ॥
तिरया तेल नहिं देह छुवावै । अष्ट सुगन्ध¹ अंग नहिं लावै ॥
पुरुषन की राखै नहि आसा । गुरुका रहै चरणही दासा ॥
दो० काम क्रोध मद लोभ अरु, राखैना अभिमान ।
रहै दीनताई लिये, लगै न माया वान ॥
छल नहिं करै न छल में आवै । दम्भ² झूठके निकट न जावै ॥
टोना यंत्र भूत नहिं ध्यावै । झूठ जानके सब बिसरावै ॥
धातु रसायनि मन नहिं लीजै । झूठ जानि याहू तजिदीजै ॥
स्वांग तमाशे बाग न जैये । आसन ऊपर बैठा रहिये ॥
दृढ़ ह्वै लगै युक्तिके माहीं । ताते विघ्न होय कछु नाहीं ॥
रूठा रहै जगत लोगन सों । न्यारा रहै सबही भोगन सों ॥
इन्द्र आदि लौं सुख संसारी । नेक न चाहै चित्त मँझारी ॥
सिमिटि रहै हिय माहिं समावै । ऐसे योग सधै सिधि पावै ॥
दो० ऋद्धि सिद्धि अरु कामना, तिनकी रखै न आस ।
मान बड़ाई चपलता, त्यागै चरणहिं दास ॥
गहि संतोप क्षमा हिय धारै । संयम करिकरि रोग निवारै ॥
अहङ्कारको छोटा करिये । कुटिल मनोरथमन नहिं धरिये ॥
बसिये जितहि देश सुस्थाना । निर उपाधि धरती अस्थाना ॥
भली भूमि लखि गुफा बनावै । नीची ऊंची रहन न पावै ॥
१ तेल, फुलेल, चोवा, चन्दन, कपूर, इत्र, केसरि, कस्तूरी ये अष्ट सुगन्ध
कहलाते हैं २ मिथ्या बातें बनाना ॥
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