भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधर्मजहाजवर्णन । ४६
पाँव धरे सो नाहीं उठावै । करणी करता चला जु जावै ॥
फिरै जबहिं फल लैकर आवै । सो वह शूरा मल्ल कहावै ॥
कायर बीचहि सों फिरि आवै । सो वह करणी को बिसरावै ॥
आपन खोट न जानै भोंदू । वह तौ कथनीही का गोंदू ॥
दो० ऐसे जगमें बहुत हैं, वैसे जगमें नाहिं ।
कोई कोइहि देखिये, सतगुरु के मग माहिं ॥
होनहार को बहुत बतावैं । पै ताको कछु मर्म न पावैं ॥
कहैं कि होनी होय सुहोई । ताको मेटिसकै नहिं कोई ॥
याको समझ उपाय न करिया । श्रद्धा तजि कायरह्वै परिया ॥
समझि निखट्टु¹ गृही भहे । वेष धारि बिन करणी रहे ॥
जानतनाहिं जु पिछिली करणी । अब कै भई जु होनी भरणी ॥
परालब्ध² अरु भाग्य कहावै । पिछले कर्म्मन से उपजावै ॥
अबके करै सु आगे पावै । कछू कछू फल अभी दिखावै ॥
कै काहू गाली दै देखो । कै काहू को मारि विशेखो ॥
कै काहूको अशन खवावो । कै काहूको शीश नंवावो ॥
कै करि चोरी द्यूतहि³ खेलौ । कै काहूको गुस्सा झेलौ ॥
दोनों का फल आगे आवै । चरणदास शुकदेव बतावै ॥
प्रगट देखिये यही तमाशा । नीच ऊंच करणी परकाशा ॥
दो० कोटि यही उपदेश है, यही जु सगरी बात ।
करणीही बलवंत है, यों शुकदेव दिखात ॥
मनकी करणी ज्ञान है, परमातम लखिलेय ॥
ब्रह्मरूप है जाय जब, छूटै सबही भय ॥
भवसागर⁴ में भय घने, ताकी लगै न आंच ॥
झूठेको भय बहुत है, भय नहिं व्यापै सांच ॥
१ कोईकाम न करनेवला २ कर्म्म ३ जुवां ४ संसार ॥