भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
ऐसे कहि कर गहि लै चाले। पार नदी के जंगल घाले ॥
शुभकरणी को करि वह राजा। अपने महलन जाय बिराजा ॥
इतसे भी उत सुख बहुभारी। ना कोइबैरी ना जंजारी ॥
अपनी करणी से सुख पावै। रहै अशोक न चिन्ता आवै ॥
कहि शुकदेव चरणहीं दासा। शुभ करणी करि पाया बासा ॥
दो० ऐसे मानुष देह को, जानहुँ नगर समान।
राजा यामें जीवहै, शुभकरणी परमान ॥
नाहिं तौ चौरासी जङ्गल है। भांति भांतिका जितही भौ है ॥
पशू पशूको जित भषिजावै। नित भयमानि नहीं सुख पावै ॥
बहु दुख पावै खोटी करनी। जैसी करनी तैसी भरनी ॥
शुभकरनी को जो नर धावै। बहुत भांति सुख सुरपुरजावै ॥
दो० भूप उमरअपनी किया, अपना पूरण काम।
ऐसेही शुभ कर्म्म सों, तुमहूँ पावो धाम ॥
अरु इक कथा कहौं अतिनीकी। जा सुनिजाय अविद्या१ जीकी ॥
इक राजा था बहु परबीना। सो वह पुत्र विनाथा हीना ॥
एक समय वहि रोग जुआया। पुत्र बिना बहुतै कलपाया ॥
कौनकाज अब ह्यांको करिहै। जो मेरो देहीं यह मरिहै ॥
यह मन करत सिद्ध इकआया। राजाने सब वाहि सुनाया ॥
सिद्ध कही सुत गोदं घलावो। बेटाकरि तिहिराज बिठावो ॥
राजा कही जु ध्यान लगावो। राज भाग में ताहि बतावो ॥
फिरिउनकही जुखोलि दिखाऊं। साहूकारका पुत्र बताऊं ॥
वाके भाग्य लिखा यह राजा। ताको सुत करि कीजै काजा ॥
फिर उन वाकोगोद जु लीन्हा। ह्यांको रोज काज सब दीन्हा ॥
कोइक दिनमें उन तनत्यागा। पुत्र राज्य करने तब लागा ॥
१ मूर्खता २ बैठालेव ॥