भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४ श्रीस्वामीचरणदासजीकग्रन्थ ।
यह सुनि परजा सब हरषाई । अपने अपने घरको आई ॥
कोउ सिरकी कोउ छप्पर डारा । पका मंदिर नाहिं विचारा ॥
चोरी जारी सबै बिसारी । ढीले भये सभी व्योहारी ॥
अरु साधुनकी वृत्ती धारी । बालक युवा जेंरठ नरनारी ॥
रहे नहीं वै खोटे मनके । भये तपस्वी कृश सब तनके ॥
दो० जो कछु गाड़ो द्रव्य गृह, करी न ताकी आंट ।
राखि लिया षटमास का, अरु सब दीन्हा बांट ॥
जिते धनिक तिन सब यह कीन्हा । हते अनाथ तिनहि दैदीन्हा ॥
कहैं परस्पर धन कहा करिहैं । छठे महीना पीछे मरिहैं ॥
यही समझि उपजा बैरागा । सकलइन्द्रियन का रस त्यागा ॥
फीके लगे भोग सब जगके । सहज काम तब छूटे अघके ॥
सबकी दशा एक जो भई । मौत जानि करि चिन्ता ठई ॥
दिन दिन दुर्बल होते जावैं । हरिहीका जप ध्यान लगावैं ॥
एक एक दिन लागै प्यारा । भजन करैं जगिन्यारा न्यारा ॥
हठ अरु वाद न कोऊ ठानै । इक इक घरी अमोलकि जानै ॥
कहैं कि खोवैं तौ कित पावैं । कथा कीर्तन सों चित लावैं ॥
कथा कीर्तन जित तित होई । साधु समागम ह्वै गये सोई ॥
घरघर शुभ कर्मन व्योहारा । धर्म पकड़ि अधरम सब डारा ॥
ज्यों ज्यों दिवस अवधिके आवैं । घने घने शुभ कर्म कमावैं ॥
दो० जाको होवै मौतभय, जगमें लगै न चित्त ।
झुकै रामकी ओरही, बहुत लगावै हित्त ॥
उन पुरुषनकी यह गति भई । जगकी चाल डारि सब दई ॥
लाड़ चाव व्योहार न कोई । ब्याह सगाई पुत्र न होई ॥
काम क्रोध नहिं उपजै मोहा । लोभ मान नहिं प्रीति न द्रोहा ॥
१ चाल २ वृद्ध ३ प्रेम ४ गुणों का गान करना ॥