भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जो गुरु सों करे मानहीं, ताकी गतिहोय नाहीं ॥
कहैं गुरू शुकदेवजी, चरणदास परवीन ।
मनसोंतजि अभिमानको, गुरुसों रहिये दीन ॥
मान न काहूसों करै, सबही सों आधीन ।
समरथ हरिकी भक्तिमें, जगतकाज सों हीन ॥
दश कर्मों को जानिये, महापापकी खानि ।
तन मन बचन सँभारिये, यहीजु अधिकसयानि ॥
कहूं एक दृष्टान्तही, सो परमारथ भेश ।
सुनि समुझै हिरदै धरै, तौ लागै उपदेश ॥
रहै सुहावत नगर इक, बसैं लोग सुखमान ।
नर नारी सुन्दर सबै, अरुधनवन्त बखान ॥
नया करैं जहाँ भूपही, बरस दिनाके माहिं ।
संवत बीते तासुको, फिर वै राखैं नाहिं ॥
पकड़ डारदैं नदी पारा । जहां भयानक अधिक उजारा ॥
पशू आदि ताको भषि जावैं । स्वपनासा देखैं विनशावैं ॥
नयाभूप करि आज्ञा मानैं । ताको अपना ईश्वर जानैं ॥
रहैं हुकुम माहीं करजोरैं । वाको बचन न कबहूँ मोरैं ॥
छत्तरधारी छाईं डारैं । सों मैं आगे कही उजारैं ॥
कई सैकड़ों ऐसे भये । चेते नहीं निष्फल गये ॥
राजा नया और इक किया । सो वह समझा चेता हिया ॥
मनही मनमें कहै विचारे । बहुत भूप जंगल में डारे ॥
दो० बरस दिना जब बीतिहैं, हमहूँ को दे डारि ।
सरिताही१ के पारही, अधिकी जहां उजारि ॥
याको कछू उपाय बिचारौं । तासेती यह जन्म न हारौं ॥
१ नदी ॥