सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 72

धर्मजहाजवर्णन । ३७
तुमसे अधिकी मूढ़ नर, जगमें घने दिखात ॥
हुकुम बड़ा माया बड़ी, नामी बड़े जु भूप।
नर नारी बहु टहल में, सुन्दर अधिक अनूप ॥
सन्तन की गति और है, हरि गुरुसों सनमुख ।
मुक्त होय छूटैं सबै, जन्म मरण के दुख ॥
जगत बड़ाई में फँसे, परी अविद्या छाहि ।
नरक भुगति यमदण्डही, फिरि चौरासी माहिं ॥
हरि औ गुरु को शिरपर धरिये, सतपुरुषनकी सङ्गति करिये ॥
रहिये साधुनके सँग माहीं । ध्यान भजन जहाँ छूटे नाहीं ॥
है परिपक्व जहां मन रहो। गुरुमत दया दीनता गहो ॥
सहज सहज उपदेश लगावो । भूलेको हरि बाट बतावो ॥
तारन तरन बहुत जन भये । क्षमा दीनता धारे गये ॥
पै उनको अभिमान न आया । नेक न पड़ी अविद्या छाया ॥
आपा मेटि गुरूही राखा । जब बोले तब गुरुही भाषा ॥
तू अभिमानी जन्म गँवाया । पापबोझ शिर घना उठाया ॥
दो० योंही न१भकी ओरसों, वाणी भई जुआय ।
कियो गुरू्सों मान तैं, चौरासी२ को जाय ॥
तहं सों गुरु रमते भये, शिष्यहि दै फटकार ।
कहा कि तेरे तन बिषे, हूजी बड़ो विकार ॥
तापाछे कछु दिननमें, देही भयो विकार ।
निकट न आवैं तासुके, तहं के कोउ नर नार ॥
कुष्ठ भयो अर्द्धंगको, रहो न काहू योग ।
आठ पहर वाको भयो, निरोशोगही शोग ॥
तनतजिकै नरकै गयो, फिरि चौरासी माहिं ।
१ आकाश २ कुंभीपाक आदि चौरासी नरक संख्या ॥