भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधर्मजहाजवर्णन । ३७
तुमसे अधिकी मूढ़ नर, जगमें घने दिखात ॥
हुकुम बड़ा माया बड़ी, नामी बड़े जु भूप।
नर नारी बहु टहल में, सुन्दर अधिक अनूप ॥
सन्तन की गति और है, हरि गुरुसों सनमुख ।
मुक्त होय छूटैं सबै, जन्म मरण के दुख ॥
जगत बड़ाई में फँसे, परी अविद्या छाहि ।
नरक भुगति यमदण्डही, फिरि चौरासी माहिं ॥
हरि औ गुरु को शिरपर धरिये, सतपुरुषनकी सङ्गति करिये ॥
रहिये साधुनके सँग माहीं । ध्यान भजन जहाँ छूटे नाहीं ॥
है परिपक्व जहां मन रहो। गुरुमत दया दीनता गहो ॥
सहज सहज उपदेश लगावो । भूलेको हरि बाट बतावो ॥
तारन तरन बहुत जन भये । क्षमा दीनता धारे गये ॥
पै उनको अभिमान न आया । नेक न पड़ी अविद्या छाया ॥
आपा मेटि गुरूही राखा । जब बोले तब गुरुही भाषा ॥
तू अभिमानी जन्म गँवाया । पापबोझ शिर घना उठाया ॥
दो० योंही न१भकी ओरसों, वाणी भई जुआय ।
कियो गुरू्सों मान तैं, चौरासी२ को जाय ॥
तहं सों गुरु रमते भये, शिष्यहि दै फटकार ।
कहा कि तेरे तन बिषे, हूजी बड़ो विकार ॥
तापाछे कछु दिननमें, देही भयो विकार ।
निकट न आवैं तासुके, तहं के कोउ नर नार ॥
कुष्ठ भयो अर्द्धंगको, रहो न काहू योग ।
आठ पहर वाको भयो, निरोशोगही शोग ॥
तनतजिकै नरकै गयो, फिरि चौरासी माहिं ।
१ आकाश २ कुंभीपाक आदि चौरासी नरक संख्या ॥