भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधर्मजहाजवर्णन ४१
राज्य पितासों नीका कीन्हा । प्रजाआदिको सब सुख दीन्हा ॥
दो० राज करत वर्षे भई, सुखले अरु सुख दीन ।
नगर मध्य वाके कोऊ, विना द्रव्य नहिं हीन ॥
एक दिना ऐसो भो काजा । सोवत चौकि उठा वह राजा ॥
भोर भये सब फौज बुलाई । हरिकी आज्ञा सो समुझाई ॥
कहा जहांतक परजा मेरी । ताको लूटो जाय सबेरी ॥
आज्ञा ले सब फौज पधारी । प्रजा लूटि लई तिन सारी ॥
दूजे कही कि हां तुम जावो । लूटे सब ते भवन जलावो ॥
घर परजाके सभी जलाये । नीच ऊंचने बहुदुख पाये ॥
तीजे वचन भूप यों भाखो । कहाफौज सों खोज न राखो ॥
शस्त्र¹ सों बड़े बड़े नर मेलो । लड़के वाले कोल्हू पेलो ॥
यह सुनि सकलप्रजाघिरिआई । राजा पास पुकार सुनाई ॥
बहुतक राजा भये अनूठा² । अपनी प्रजा नहीं कोहुं लूटा ॥
दो० पहिले सबको सुख दिया , अब भे तुम दुखदाय ।
कारण यह कहि दीजिये , सबही को समुझाय ॥
यह कहि साहूकार ने , जो था वाका बाप ।
कुयश चला संसार में , बहुत लगाये पाप ॥
साहुकार पण्डित घने , और बड़ेही लोग ।
कोल्हूकी सुनि कतल³ की, बहुतक माना शोग ॥
आये हैं फरयाद⁴ को , सुने बिगड़ते काज ।
सकल प्रजाको मारिकै , किसकाकरिहौ राज ॥
संकल प्रजा तुव शरणहैं , बकसि देव महराज ।
अपनी अपनी भूमि में , फेरि बसैं सब साज ॥
राजा कही सु मैं नहिं जानूं । अपने मुख से कहा बखानूं
१ हथियार २ उत्तम ३ मारना ४ गोहारि