भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधर्मजहाजवर्णन । '३६
एक दिना उन यही विचारा। देखन गयो नदी के पारा ॥
जहां भूप जाजाकरि मरते। तिनके हाड़ हईं जा गिरते ॥
खड़ा जु होय देखि मन आई। नीकी ठौर बनाऊं ह्नांई ॥
दृष्टि उठाय ऊंची जो कीन्ही। कामदारको आज्ञा दीन्ही ॥
बन काटौ आज्ञा दइ एता। फेरक पांचकोस में जेता ॥
सुन्दरसा इक कोट बनाओ। तामें सुन्दर बाग रचाओ ॥
करौ हवेली१ ताके माहीं। जैसी भूपनहूँ कै नाहीं ॥
गिलंम२ बिछौने परदे लावो। अरु तय्यारी सबै करावो ॥
होय चुकै जब मोहिं सुनावो। बहुत इनाम अधिक तुम पावो ॥
दो० वैसीही बनने लगी, जैसी आज्ञा दीन।
बनते बनते बनचुकी, सुन्दर अधिक नवीन ॥
फिर राजा को आनि सुनाया। राजा सुनि बहुतै सुखपाया ॥
आछी वस्तु वहां पहुँचाई। ह्नांजो रही न सुरति लगाई ॥
कहा कि एक दिना ह्नां जाना। क्षण क्षण होय अ³वधिकीहाना ॥
पांचक गांव कोटके साथा। किये दिये लिखि अपने हाथा ॥
अपना एक हितू मन भाई। भरी कचहरी लिया बुलाई ॥
करि इनाम ताको वह दिया। वाका देखा सांचा हिया ॥
और कही जो राजा होवै। वाहि तलाकँ४ याहि जो खोवै ॥
योंही आठ महीने बीते। करणी करि भये मनके चीते ॥
दो० है निश्चित आनँदभये। चिन्ता भय नहिं कोय ॥
अपना कारज करिचुके। ह्नां ह्नां एकहि होय ॥
सुखही में वह वर्ष बिताया। अवधिबीतिफिरिवहदिनआया ॥
सब उमराव५ जु घिरिकर आये। नया भूप करने को लाये ॥
यहि सिंहासन सों दियो डारी। कहा कि तुम्हरी बीती बारी ॥
१ मकान २ गलीचा ३ अवादा ४ कसम ५ अमीर ॥
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