भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
कहा पुरुष सो इक तुम आनौ । जिनका कहासांच तुममानौ ॥
यह सुनि जवाब सवालहि वारे । आकरि बैठे सबन मँझारे ॥
सो इक नर बहुतै इतबारी । जिनकीसाखिहुतीबहु भारी ॥
तिनको लै राजा के पासा । खड़े किये सब चरणन दासा ॥
राजा उठि उन्हीं के माहीं । मिलि बैठो पुनि वाही ठाहीं ॥
राजा कही जु हरि की ओरैं । ध्यान लगावो मनको मोरैं ॥
घड़ी चारि जब ध्यानलगाया । नभ से शब्द यही जो आया ॥
दो० ढील भूप तैं क्योंकरी , इनकी कीजै जेल ।
बड़े कतलही कीजिये , छोटे कोल्हू पेल ॥
तीनहिं बार लगाया ध्यानी । वारंवार यही भइ बानी ॥
भूप कही कहा दोष हमारा । कोपित भयो जो सिरजनहारा १ ॥
अब तुम परजासों कहि देवो । कतल पेलना कोल्हू लेवो ॥
आय नरनकहि सबमें खोली । सुनि परजा ऐसे उठि बोली ॥
कहन सकल आपस में लागे । हम हैं मूरख बड़े अभागे ॥
हम शुभकर्म कबहुँ नहिं कीन्हे । तिथि पर्वहि केहुदाननदीन्हे ॥
कथा कीर्त्तन में नहिं कहे । कुटुंब जाल में पागे रहे ॥
हरि की भक्ति नहीं चित लाई । ताते अब होतो मुकताई ॥
दो० हरी ही को बिसराइया , पूत महल के काज ।
नाम रहैगो जगत में , सो भी रहा न आज ॥
चले नरक को निश्चय जैहैं । मार यमों की निश्चय खैहैं ॥
कांपत है सब देह हमारी । आपस में भावैं नर नारी ॥
ऐसे ही सब रो रो बोलैं । ब्याकुल भये धरणिमें डोलैं ॥
एक ठाँव ह्वै मता उपाया । सो राजा को जायसुनाया ॥
करजोरे मुख तृण गहिलीन्हे । नखशिखलौं तनदीन जुकीन्हे॥
१ पैदा करनेवाला ॥