भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
६१६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जिन्हों पराई नारी मारी । अरु सतगुरकी निन्दा धारी ॥
धरमशास्त्र वेद पुरानी । इनहूं की निन्दाही ठानी ॥
तीरथ की निन्दा मुखलावै । सो सूचीमुख नरकही जावै ॥
नरकजु महाघोर इक नाऊं । सो विकराल भयानक ठाऊं ॥
तामें शूकर सिंह अरु कागा । रहें भेड़िया काले नागा ॥
जिसने पाप किये बहुभारी । सो जावे वा नरक मँझारी
करम कमाये खोटे खोटे । ऐसे पाप किये जिन मोटे ॥८॥
चौपाई ॥
जो कोइ बैठ बाट क माहीं । एक एक कूं देखत जाईं ॥
पर तिरिया की ओरी झांकैं । जिनकी कागे निकासत आंखैं ॥
जो कोइ बनमें आग लगावैं । जिनका मांस सिंघही खावैं ॥
जो कोई पापी गांवही जारै । तिनकी देह भेड़िया फाड़ै ॥
परघर कूं जो पावक लावै । शूकर जिनके हाथ चबावैं ॥
जाने विष देकर नर मारे । खावैं तोड नागही कारे ॥
ऐसे वाही नरक मँझारा । वे दुख पावैं अधिक अपारा ॥
चरनदास कहैं नासहीकेता । भाषत है जो कुछ हां देखा ॥६॥
दोहा ॥
शूलरूप , इक नरक है, शूली की ज्यों जान ।
पाप किये जिन राजमें, सोई गिरत है आन ॥१०॥
चौपाई ॥
मीरगन कूं जिन तीर चलाये । करी शिकार मारले आये ॥
नाहक नर शूलों पर दोये । हेत दरब के ताचन कोये ॥
जो वा नरक माहिं ले बासा । बहुती दीखै अधिकी त्रासा ॥
करमनका फल छूटै नांहीं । देखै अपनी आंखों हांहीं ॥११॥
नासकेतलीलावर्णन । ६१७
दोहा ॥
और नरक है चौदवां, नांव अगन ही कुण्ड ।
ताहि लखै हियरा डरै, तप्त महा प्रचण्ड ॥१२॥
चौपाई ॥
पापी प्रानी कूं हां डारै । पड़ै नाहिं तो जम बहु मारै ॥
कहै पापी मैं बहुत पियासा । जल प्याकै फिर देवो त्रासा ॥
दूत कहैं सुन रे मतहीना । तैंतो दया धरम नहि चीन्हा ॥
जनमपाय यह भी नहिं कीना । काहू कूं जलदान न दीना ॥
जैंवत ग्रास न दीया पापी । नेवज की रोटी नहीं थापी ॥
ब्राह्मण कबहूँ नाहि जिमाया । गुरभाई को नाहिं खवाया ॥
अगन माहिं आहूत न जानी । भूखे कूं दिया अन्न न पानी ॥
धृग धृग रे मूरख नरलोई । अपना किया भुगत अबसोई ॥
बिन भुगतैं छुटकारा नाहीं । क्यों नहिं गिरता याके माहीं ॥
अब तुम अगन कुण्ड कूं झेलो । कोई न संगी भुगत अकेलो ॥१३॥
दोहा ॥
गहन जु सूरज चन्दका, तामें किया न दान ।
पेटभरा ज्यों बैल सम, करी न पुण्य पहिचान ॥१४॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने नरकवर्णनोनाम दशमोऽध्यायः॥ १० ॥
नासकेत उवाच ॥ चौपाई ॥
नरक तेल जंत्र इक नाऊं । कोल्हू सूरत ताहि सुनाऊं ॥
तामें पतित गिरत हैं जाई । करम किये ए लोग लुगाई ॥
जो कोई चोरी निन्दा करै । भूमि पराई लेत न डरै ॥
खेत बिराना मूसै चलिकै । परतिरिया कूँ छीनै बलकै ॥
सोतो तेल जंत्र के माहीं । पिलपिल पापी बहु दुख पाहीं ॥
६१८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
दुखद सोलवां वा भुगतावै। घीव तेल ज्यों मनुष चुरावै ॥
भक्ति छुटावै निगुरा करै। झूठे अवगुन काहू धरै ॥
वाकूँ तेल कड़ाहे तलैं। अपने नैनन देखै भलैं ॥
मदिरा अचवैं आमिष खावैं। तिनकूँ ताता तेल पिलावैं ॥
नरक सतरवां लेहु पिछाना अन्धकारज्योंकरूं बखाना ॥१॥
दोहा ॥
जो राकस वै जीव हैं, बड़ी आरबल देह ।
तन ऊंचा बल है घना, तहाँ परत हैं वेह ॥२॥
चौपाई॥
सुनौं कहूँ जो कुछ हां देखा। सो तुमसँ राखूँ नहिं नेका ॥
अस्थान कालका एक निहारा। जो मनुषों का करै संहारा ॥
महाभयानक वह अस्थाना। बड़े कष्ट सूं हो हां जाना ॥
देखा दूत एक हां भारी। जाका तन मोटा बलकारी ॥
दहने करमें दण्ड जु वांकै। बावैं में फांसी है जाकै ॥
आंखें रकत रूप बिकरारा। अरु भैंसे पर है असवारा ॥
अरु जो किंकर है वा पासा। उनका भी तनकालहीकासा॥३॥
दोहा ॥
और नाम किरतांत है, उसी काल का जान ।
अरु जो वाके दूत हैं, सो किरतांत पिछान ॥ ४ ॥
चौपाई ॥
एक समय वह धरमही राजा । अपने दूतन सूं कहो काजा ॥
अज्ञा ले जमदूत पधारे । दैतराज देखा तन भारे ॥
दूतन शस्तर तहाँ चलाये। दैतराज वै मार भगाये ॥
अरु दैतों ने बहुतक कूटे। भई लराई शस्तर टूटे ॥
धरमराय पै भागै आये। हां के कौतुक सबै सुनाये ॥
नासकेतलीलावर्णन । ६१६
कही कि दैतन हम कूं मारा । नैक न माना हुकमतु म्हारा ॥
धरमराय सुन बहुत रिसाया । कालरूप कूं निकट बुलाया ॥
दोहा ॥
कहा कि वाहों के बली, इनके संग हां जाव ।
दानों सहित जुझूप कूं, मार पकड़ ले आव ॥ ६ ॥
चौपाई ॥
जम की आज्ञा ले वह काला । जै जै शब्द कहत उठ चाला ॥
वाके संग दूत घन चाले । अतिभैमान महाबिक्राले ॥
अपने अपने शस्तर तौलैं । चलौ चलौ आपस में बोलैं ॥
काल वही जिनका है नायक । पतितनकूं भारी दुखदायक ॥
खांडा है दहिने कर माहीं । चन्द्रहास तिह नांव कहाईं ॥
फांसी लिये जु बायें हाथा । ऐसें गया दूत ले साथा ॥
दूत काल के अरु वे दाने । जुद्ध करनलागे घमसाने ॥
मुगदर बज्जर लाठी मारैं । गदा जु फांसी सेल सँभारैं ॥७॥
दोहा ॥
खडग सिला पत्थर बड़े, अरु मुष्ठों की मार ।
दोऊ ओर से चलत है, तनकी नाहिं सँभार ॥ ८ ॥
चौपाई ॥
ऐसा जुद्ध करै न डरावैं । देखत रोम खड़े होजावैं ॥
अन्त यहीं दूतौ वे मारे । दैत्यों के नायक जो हारे ॥
और काल नैं डंडौ मारै । तड़फै बहुत धरन पै डारै ॥
मुगदर गदा मार बस लाये । बांध फांसियों पकड़ चलाये ॥
धरमराय के आगे कीने । तब राजा वै नीके चीन्हें ॥
फिर कही इनकूं लेकर धावो । चित्रगुसही पै ले जावो ॥
आयसु ले फिर ह्वांई आये । चित्रगुसकूं जाय दिखाये ॥
६२० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चित्रगुप्त ने किया बिचारी । बड़ पापी हैं येसब भारी ॥९॥
दोहा ॥
दूतोंने जतनों सहित, बांधा सावहीधान ।
भाग न जावैं छूटकै, बलवन्ते परवान ॥१०॥
चौपाई ॥
फिर वे नरकमाहिं डलवाये । इनकूं बहुते त्रास दिखाये ॥
ह्वांसूं काढ़ें बहुतीबारा । फिर दें अगन कुण्डमें डारा ॥
ऐसे दैतन कूं भी देखा । पाप पुन्यका देवै लेखा ॥
तातें सुनों ऋषी परबीना । रहै नहीं धनवंता हीना ॥
ना रहै बली न बूढ़ा बारा । काल सभी का खानेवारा ॥
कै घरमें कै बनके माहीं । काल कहीं छोड़त है नाहीं ॥
काल वली की फिरै दुहाई । कोइ न छोड़ा रंक अरु राई ॥
ना कोई संगी ना कोई साथी । बहुतोंगहिगहि छोड़ी बाथी ११
दोहा ॥
तातें या संसार में, चित्त न लावो कोय ।
यह निहचै कर जानलो, अपना कोई न होय ॥१२॥
चौपाई ॥
मूये पाछै काकूं रोवैं । सुपना सा देखें जब सोवैं ॥
जब जागें जब कोइ न कोई । ऐसी भांती जग यह होई ॥
छोटी बड़ी आरबल जानौ । यह सब काल चरित्र मानौ ॥
ब्याधरोग में यह को परै । काल खेल यह सबही करै ॥
सबही सृष्ट कालमुख माहीं । कोट जतन सूं बचै जु नाहीं ॥
इसी जगत का ऐसा लेखा । ज्यों स्वांगी धर नाचै भेखा ॥
जैसे बाट बटेऊ जावैं । छांहि वृक्षकी टुक ठहरावैं ॥
फिर वह धूप माहि ही धावै । जबलगनाहि ठिकाना पावै १३
नासकेतलीलावर्णन ६२१
दोहा ॥
थोड़ा सुख संसारका, तामें दुःख अपार ।
चित मत दोजो तासमैं, मैं कहूँ बारम्बार ॥ १४ ॥
चौपाई ॥
साध संगत गुरचरन मनावो । तातें काल चपेट न खावो ॥
हरि की ओरी चित्त लगावो । यातें मुक्ति ठिकाना पावो॥१५॥
दोहा ॥
नरक विलोचन अब कहूँ, सो अठारवां जान ।
वे पापी वहां परत हैं, जिनकी दिष्टकुध्यान ॥ १६ ॥
चौपाई ॥
राह चलत तहिं जीव निहारैं । बाजे देखे तो बीमारैं ॥
परतिरिया जो देखत जावै । करै मनोरथ बहुत लुभावै ॥
क्रोधदिष्ट साधन कूं देखै । तिनकी निन्दा करै बसेसै ॥
देख किसीका पड़दा खोलैं । बिषै तमासे ही में डोलैं ॥
साध गुरू की ओर न झांकै । ठाकुरद्वारे प्रीति न राखै ॥
विधवा नारी काजल आंजै । आन पुरुषही के वै काजै ॥
ऐसे जो हो लोग लुगाई । तिन्हें नरक यह अतिदुखदाई ॥
गिरतैं बिन आंखन होजावैं । चीसैं बहुत महादुख पावैं ॥
रणजीत कहैं उन नैन निहारा । कहा ऋषिनसूं लखि विस्तारा॥
और अनूठा नरक बताऊं । सो पिरथी ऊपर दिखलाऊं १७॥
दोहा ॥
सो याही मृत्युलोक में, देखा अपने नैन ।
यह परगट प्रतिक्ष है, पापी कूं दुख दैन ॥१८॥
चौपाई ॥
जगमें नरक कहूँ अब खोलैं । महा कंगाल मांगते डोलैं ॥
६२२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
नागे भूखे और जडाये। जूताना जिनके ही पाये॥
पेट भरन कूं जतन करत हैं। बहुत पचैं ना उदर भरत हैं॥
हैं दारिद्री नितही रोगी। अंधरे कोढ़ी निसदिन सोगी॥
ऐसे देखो जो नर नारी। सब कूं जानौं नरक मंझारी॥
जो कोइ पड़े बंध के माहीं। जीवत नरक मांहिं भुगताईं॥
खोटा करतैं नाहिं डरावैं। जिन कूं प्यादे जम लेजावैं॥
औगुनगारे कूं बहु मारैं। पाछै जकड़ बंध में डारैं॥१९॥
दोहा॥
निरख परख निहचै करो, मन में लीजै जान।
अपनी आंखों देख लो, मैं जो किया बखान॥२०॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने यमशासनो नाम एकादशोऽध्यायः॥११॥
ऋषिरुवाच॥ चौपाई॥
कह ऋषीश्वर सुनहो दाता। नासकेत तुम परमगियाता॥
जगमें बसना दीखै ऐसा। रैन समै बृक्षपक्षी जैसा॥
राह माहिं ज्यों थका बटाऊं। बैठ छाहिं फिर चलै उठाऊं॥
आवा गवन यों जगत मंझारा। हमकूं डर लागत है भारा॥
तू जमलोक देखकर आया। हमकूं ऐसा ज्ञान दिढाया॥
अब इक बात पूछत है औरी। सभी ऋषीश्वर दोउ करजोरी॥
याका उत्तर हम कूं दीजे। हमें सनाथ आज तुम कीजे॥
सबै पापका फल दिखलाया। सो सब हमरे निहचै आया॥१॥
दोहा॥
पुन्य करन के फलन को, अब तुम कहो विचार।
जो जो देखो नैनही, सुखपावत नरनार॥२॥
चौपाई॥
जो ये लोग दान पुन्य करैं। फलपावैं कहा जब यह मरैं॥
नासकेतलीलावर्णन । ६२३
किरपा कर कर सबही कहिये । हम कूं भी ह्यां कीया चहिये॥
नासकेत उवाच ॥ चौपाई ॥
नासकेत जब वचन उचारा । सो सो कहूं जु नैन निहारा ॥
जगमें सील दयाही सुखिया । पुण्यदान सू होवै सुखिया ॥
जो नर इनसेती चितलावैं । बाट माहिं बहुतै सुखपावैं ॥
कोयल राह बिरछ बहु फले । महा सुगन्ध छांहिं उनतले ॥
फलखाने कूं मारग माहीं । चढ़े बिमानन ऊपर जाई ॥
मनुषा जनमपाय जिन कीन्हा । जीवत दान कछू ह्यां दीन्हा ॥
आय मिलत हैं मारग माहीं । सुख आनन्द सूँ खाते जाई ॥
जिन जीवों ऐसे पुन कीन्हे । दूध दही घृत दिये नवीने ॥ ३ ॥
दोहा ॥
नाना भांत मिठाइयां, अरु मेवा दई जान ।
नाना विध भोजन दिये, सोई मिलत हैं आन ॥ ४ ॥
जो कछु करै सो आपकूं, परकूँ करै न कोय ।
अपना कीया पाय है, नीच ऊँच क्यों न होय ॥ ५ ॥
चौपाई ॥
आगे बाजे बजते जावैं । हरिजस अधिक नायका गावैं॥
ऐसैं जावैं स्वरग मंझारै । लैन अप्सरा आवैं द्वारै ॥
निरत करत भीतर लेजावैं । सिंहासन ऊपर बैठावैं ॥
धरम नीक कूं देखें कोई । उठ उठ आन मिलत है सोई ॥
बहुतक जहां अप्सरा नारी । दिव बस्तर दिव भूषन वारी ॥
चोवा चन्दन कोई लगावै । कोई चावसों पवन दुरावै ।
कहै कै हमतो तुमरी दासी । हम तुम रहें सदाही पासी ॥
एक साथ मिल हरिगुन गावैं । करें विलास परम सुखपावैं॥६॥
६२४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दोहा ॥
केलि करें स्वरग लोकमें, जिन किये ऐसे दान ।
जुदे जुदे चरनदास अब, ताको करै बखान ॥ ७ ॥
चौपाई ॥
जिन तलाव अरु कुएं खुदाये । बाट माहिं जिन दुरम लगाये ॥
अरु जिन ऐसे दत्तव कीने । बहुत दान विप्रन कूँ दीने ॥
सोना रूपा मंगे मोती । पन्ना हीरा उज्जवल जोती ॥
माणक चुन्नी और नगीना । दान जवाहरका जिन दीहा ॥
गहने भाड़े सिज्या दीनी । मन्दर भूमिदान जिन कीनी ॥
ताँबा और कपूर-सुहाये । अन्नदान भोजन जिन ख्वाये ॥
ऐसी बस्तें देने वारे । जाय बसत हैं स्वर्ग मंझारे ॥
पहिले धरमराय पै जावें । गण सुख सूं ले ले ही धावैं ॥८॥
दोहा ॥
खड़ा करें धर्मराय ढिग, कर-कर बहुती चाव ।
तब राजा ऐसें कहैं, स्वर्गलोक लेजाव ॥ ६ ॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने स्वर्गमार्गवर्णनोनाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
नासकेत उवाच ॥ दोहा ॥
अब स्वर्गों का कहत हूं, जुदा जुदाही नावैं ।
शुभकर्मन सूं पाइये, ऐसी उत्तम ठावैं ॥ १ ॥
पहिला स्वर्ग सुहावना, है कुबेर का लोक ।
यक्ष गन्धर्ब जहाँ अपसरा, भोगीम हा अशोक ॥ २ ॥
लोक बरुनकी छवि घनी, रतन जुड़े अस्थान ।
बाग घने शोभा घनी, बड़े सुखों की खान ॥ ३ ।
इन्दर की अमरावती, रही स्वर्ग छवि धार ।
नृत्य करत हैं अप्सरा, अधिकी जहाँ बहार ॥ ४ ॥
नासकेतलीलावर्णन । ६२५
रोग बुढ़ापा भय न हां, जो कोइ पहुँचे जाय ।
रतन जड़े मन्दिर मिलें, भोगैं भोग अघाय ॥ ५ ॥
सोमलोक में सुख घना, पावै अति ही चैन ।
रनजीत कहैं वहाँ जाय 'कर, देखे अपने नैन ॥ ६ ॥
आदित्य लोक में भोग है, नाना विधि सुखदान ।
दिव्य देही पावै जहाँ, अधिकी रूप निदान ॥ ७ ॥
शिवका लोक सुहावना, शोभा कही न जाय ।
जो जैसी इच्छा करै, तैसा ही फल पाय ॥ ८ ॥
सभा मुनिन-की ललित है, तीरथ मूरत धार ।
सब परबत देही धरैं, घनी अप्सरा नार ॥ ६ ॥
ब्रह्मलोक सबसे बड़ा, तेजवन्त अधिकाय ।
अति उज्ज्वल निर्मल महा, दृष्टि नहीं ठहराय ॥ १० ॥
दमकैं मन्दिर रतन के, नाना विध के भोग ।
वही बसैं वहाँ जायकै, जो साधै तप जोग ॥ ११ ॥
सात स्वर्ग बरनन करे, सूक्ष्म कहे जनाय ।
जिस करनी सों जाय वहां, सो अब कहूँ सुनाय ॥ १२ ॥
चौपाई ॥
सुनो ऋषीश्वर सबै सुनाऊं । धर्मिष्ठों के भोग बताऊं ॥
धर्मी पुरुष बसत जा ठाईं । नाना सुख आनन्द तहां ही ॥
दूध दही घृत अरु पकवाना । सहत जहाँ मेवा है नाना ॥
दिव्य गहने जहाँ रतन जड़ाऊ । रेशम बस्तर अधिक सुहाऊ ॥
जहाँ अप्सरा सेव करत हैं । आज्ञा माहीं खड़ी रहत हैं ॥
अद्भुत बाजे बहुत बजत हैं । महा विनोदा तहाँ रजत हैं ॥
जो कोई कूर्वां ताल खिनावै । और बावड़ी बाग बनावै ॥
सुरग माहिं वह आनन्द पावै । बहुतकालमृत्युलोक न आवै॥१३॥
६२६ स्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दोहा ॥
भूमि गऊ अरु हेमका, और बसन दे दान ।
सो वे धरम प्रभावते, रहैं स्वर्ग सुखमान ॥ १४ ॥
चौपाई ॥
आनन्द करते देखे भाश । कहूँ जो अपने नैन निहारा ॥
जिन नर गुर की सेवा करिया । हरिकी पूजा मनमें धरिया ॥
मात पिता का सेवन कीना । जथाशक्ति कछु दान जु दीना ।
कन्द मूल फल अन्न जु दीया । विप्रसाध का आदर कीया ॥
हरषमान भोजन जो खवाया । चलती बारी शीस नवाया ॥
तब वह दान बिरध हो फलैं । सोई आय प्रानी कूं मिलैं ॥
सुख पावै तुष्ट आनन्दा । जो कोई बोवै धर्म का कन्दा ॥
जो कोई पुन्यदान ह्यां देवै । कुबेर लोक जाका फल लेवै ॥ १५ ॥
दोहा ॥
कियो अगनहोत्र सदा, कियो जज्ञ अरु दान ।
कामलालसा ना कियो, जती रहै बेजान ॥ १६ ॥
चौपाई ॥
[L
नासकेतलीलावर्णन । ६२७
दोहा ॥
पनही नांगे देत है, प्यासे पानी देत ।
चरणदास यों कहत हैं, फल पावन के हेत ॥ १८ ॥
चौपाई ॥
भांड़े वस्तर घोड़े हाथी । गौवें देवे बच्छो साथी ॥
देवे ऊँट पलाने साजैं । सो जो इन्दर लोक विराजै ॥
बहुतक भोग करै वरठाई । रथ विमान चढ़ि रमै तहांहीं ॥
मोर लगे काहू रथ साथा । हंस लगे काहू विख्याता ॥
कैयों के हाथी अरु घोड़े । कैयों के सारस के जोड़े ॥
अपने धरम दान के कीये । देवत होय स्वरग सुख लीये ॥
देवसुता बहु सेवा करें । धरमनीक कों हित बहु धरें ॥
जिनका रूप जानिये ऐसा । अगन तपा सोना है जैसा ॥
शुद्ध फटक ज्यों निर्मल देहा । रतन जटित हैं जिनके गेहा ॥
कंठ माहिं रतनों की माला । महारूप धारै वे बाला ॥१९॥
दोहा ॥
वाजे सुघड़ बजावहीं, निरते अति चतुराय ।
धरमनिकों के कारने, अस्थापी धरमराय ॥ २० ॥
हां जो है धर्मात्मा, चढ़े विमानों देख ।
जहां इच्छा तहां जात हैं, क्रीड़ा करें अनेक ॥ २१ ॥
अन्नदान के किये तें, पावें अमृत भोग ।
तातें सबही नरनकूं, दानही देना जोग ॥ २२ ॥
चौपाई ॥
जो नारी ऐसा प्रण धारै । पतिव्रता हो धर्म सँभारै ॥
पहिले सर्व कुटुंब को खवावै । पीछे बचा आपहू खावैं ॥
अरु अपने पति कूं नित सेवे । सो वह इन्द्रलोक फल लेवे ॥
६२८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
देही दिव्य रूप धरि रहिया । सुन्दर एक विमान जु लहिया ॥
रतन जड़े घर माहिं बिराजैं । आठो सिद्धि खड़ी छबि छाजैं ॥
शील बरत में सांची नारी । पति की आज्ञा कबहुँ न टारी ॥
तिरदेवा सूं अपने पति कूं । अधिक जानती है वह हित सूं ॥
परपति के वह जाय न नीरा । सबकूं जानै बाप अरु बीरा ॥
अन्यपुरुष के छुवे न मोती । अपने पति की पहिरे पोती ॥
तिरलोकी जाकूं सिरनावै । जहां तहां वह अस्तुति पावै ॥
स्वर्ग माहिं सुख लेने वारी । शुभ लक्षण सब बात सँवारी ॥
पति के संग लगीही रहै । काहू से पिया की नहि कहै ॥
दुख विपता में संग नहि छाड़ैं । अपने पतिही सूं हितमांडै ॥
बुरा भला पति कूं नहिं जानै । हरिही की सम ताहि पिछानै ॥
बुरी भली आज्ञा जो करै । सबही माने नैक न टरै ॥
कोढ़ी अँधरा जो पति वाका । चितसूँ सेवन करै जो ताका ॥
पुरुष मरै जावै जग सेती । वाके संग जलै कर हेती ॥
पति कूँ कष्ट होय दुख मानै । वाका सभी आपना जानै॥२३॥
दोहा ॥
शुभकर्मी भर्ता भवै, कै षट कर्म करै ॥
मान भंग नहीं करै, सेवा चित्त धरै ॥ २४ ॥
चौपाई ॥
भर्ता पुन्य करै सुख मानै । पाप करै जब दुख हिये आनै ॥
ऐसे कर्म करै। जो नारी । पति समेत जा स्वर्ग मंझारी ॥
इन्द्रलोक में जाय बिराजै । सहस चौकड़ी लों वहाँ राजै ॥
रतन जड़े भूषन रहें पहिरें । मुतियन के हिये हार जुलहरैं ॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने स्वर्गवर्णनो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
नासकेतलीलावर्णन । ६२६
नासकेतउवाच ॥ दोहा ॥
ब्रह्मभोज जो देत हैं, जज्ञ करें चितलाय ।
और तपस्या करत हैं, अपने तनको ताय ॥ १ ॥
चौपाई ॥
जेठ मास पंच अगनी तापैं । चार ओरही पावक आपैं ॥
पँचवीं अगन सीसपर आना । यह पँच अगनी लेह पिछाना ॥
पूस माह में ऐसे धारे । सहस धार के लेने वारे ॥
टिगटी पर मटका धरवावैं । सहस छेद तामें करवावैं ॥
जल भरवा तल बैठें सोई । ऐसा कष्ट करै जो कोई ॥
सो वे रतन जड़े घर पावैं । सोमलोक में बहु हुलसावैं ॥२॥
दोहा ॥
सोनेका जो दान दे, सूरलोक कूं जाय ।
अरु कपड़े का जो करैं, वाही लोक रहाय ॥ ३ ॥
चौपाई ॥
आसोज अरु कातिक जब आवैं । तिनमें विप्रन कूं भुगतावैं ॥
खीर खांड भोजन करवावैं । साध ब्राह्मण नोत जिमावैं ॥
दक्षिणा दे टीका जब काढैं । वाका धर्म अधिकही बाढैं ॥
पौह माहं दे लकड़ी दाना । बहु बिधदेह जडावल नाना ॥
बैशाख चैत ऐसा जिन कीया । अन्नदान मंगतों कूं दीया ॥
जेठ साढ़ जिन पानी प्याये । गोरस दान दिये मनभाये ॥
ते जिय जावैं स्वर्ग मंझारी । आनन्द पावैं अधिक अपारी ॥
दानदिये फल आगे आवैं । नाना भोगकरैं सुख पावैं ॥
जिन पति संग जलाई काया । याहूका फल अधिक बताया ॥
साठ किरोड़ बरष वह नारी । रहै सुरके लोक मंझारी ॥
सो वह दिव मारग कँ पावै । पति सूँ कर जोरे ही जाव ॥
२
६३० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
शुभ मग माहीं वृक्ष घनेही । सूरज तुल्य बिमान बनेही ॥
नदियां दूध सहत दधिघीकी । अरु मीठे जलही की नीकी ॥४॥
दोहा ॥
जहां पटंबर बादले, अरु वसनन की छांहिं ।
सूरज ही के लोककूँ, ह्यां होकर वे जाहिं ॥ ५ ॥
चौपाई ॥
जो सूरज के सेवक जानौं । सूरही लोक बसत मन आनौं ॥
सुखदाई जानौं वह लोका । जहां बसै कुछ रहै न शोका ॥
अरु बाजों के शब्द जहां है । गन्ध्रव लाखों रहत तहां है ॥
वस्तर भूपन पहिरै आवैं । गावैं नाचैं ताहि रिझावैं ॥६॥
दोहा ॥
जो सेवक महादेवके, पहुंचै वाके लोक ।
सुख सेती जहां रहत है, निर्भै अधिक असोक ॥ ७ ॥
चौपाई ॥
पर कन्या का ब्याह रचावैं । परमारथ के हेत करावैं ॥
विप्पर बालक देह जनेऊ । ऐसे कारज मैं चित देऊ ॥
अरु कोई ऐसा कारज आवै । परकारज को उठ उठ धावै ॥
स्वर्गलोक पावत है सोई । भावैं नर नारी क्यों न होई ॥
बिना दान शिवलोक न पावै । धरमहीन कैसे कर जावै ॥
रतन जड़े नाना छवि वाकी । सब शोभा वरनुं कहा जाकी ॥
जो ब्रह्मा के सेवक होई । वाके लोक बसत है सोई ॥
आनंद करै महा सुख पावै । ब्रह्मलोक को जो कोइजावै ॥
जो ब्राह्मण अपना धर्म राखै । करै सुकर्म झूठ नहिं भाखै ॥
वेदपाठ साधै षट करमन । संध्या गायत्री अरु तरपन ॥
ऋतुवन्ती नारी पै जावै । और दिना चित नाहिं लगावै ॥
नासकेतलीलावर्णन । ६३१
सब मनुष्यों से हित कर बोलैं । निंदा त्याग भली मुखखोलै ॥
शील दया हिरदै में धारैं । सो ब्रह्मा के लोक पधारैं ॥८॥
दोहा ॥
ज्यों क्षत्री धर्म आपने, सावधान जो होय ।
बस्ती की रक्षा करै, लोग दुखी नहिं कोय ॥ ६ ॥
चौपाई ॥
अपना अंश बांट कर लेवै । साध ब्राह्मण गऊ जु सेवै ॥
साधन की सेवा चित धरै । रनमें जूझै सनमुख मरै ॥
सोवै स्वर्गलोक कूं जावैं । भोगैं भोग बहुत सुख पावैं ॥
वैश्य शीलजुत गऊ चरावैं । साध ब्राह्मण कूं सिरनावैं ॥
बोलैं सांच बणज के माहीं । सत व्योपार झूठ कछु नाहीं ॥
शूदर अपने धर्म मंझारी । सांचे दयावन्त उपकारी ॥
सेवक गऊ बिरामन केरा । अपने गुरुका मनसों चेरा ॥
कोइ अतीत और गुरुभाई । सेवा कर बहुत चितलाई ॥
ऐसे चार बरन जो लेखे । चढ़े विमान जात मैं देखे ॥
और जिन्होंने लक्ष्मी धाई । लोक कामना पहुँचै जाई ॥१०॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने स्वर्गवर्णनोनाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
नासकेत उवाच ॥ चौपाई ॥
जिस जिस देवतकूं कोई धावैं । ताके लोकमाहिं वह जावैं ॥
ठाकुर का कोई भक्ता लसैं । वाके लोकमाहिं जा बसैं ॥
करै विनोद महासुख भारी । कै हो पुरुष और कै नारी ॥
दियाजिन्हों दधि दूध मिठाई । भोजन दिये महा सुखदाई ॥
दिया घीव रस सोना रूपा । छायाकरी हरी जिन धूपा ॥
मोती माणक गुली कपूरा । दिये दान जिन बस्तर पूरा ॥
बहुबिध दान करैं जो केता । तीरथ बर्त करें अरु जेता ॥
६३२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जाका फल मनमें नहिं धरै। सब ठाकुर कूं अरपन करै ॥
दान करै हरि के हित बोवै। सो बैकुंठ परापति होवै ॥
तातें अपनो भला करीजै। धर्मपंथ में सदा रहीजै।
गुरू ब्राह्मण कूं जो मानै। जो गृहस्थ कूं बेद बखानै ॥
जो गृहस्थ के साधू आवै। देखत उठकै सीस नवावै ॥
आदर आसन दे बैठारै। मुखसूं मीठे बचन उचारै ॥
जथाशक्त भोजन करवावै। कंदमूल जैसा घर पावै ॥
जिन साधोंका सेवन चीन्हा। देवत पित्तर पूजन कीन्हा ॥
साध समान जगत के माहीं। और धरम कोइ दीखै नाहीं ॥
जिनकी अस्तुति राम बखानी। बेद पुरानन में हो जानी ॥१॥
दोहा ॥
एक समय धरमराय सब, लीने दूत बुलाय ।
कहा कि तिरलोकी बिषै, हरिजन हैं अधिकाय ॥ २ ॥
चौपाई॥
एक बात यह जाने रहियो। मेरा कहा जो नीकै लहियो ॥
साधुरूप कूं ऐसे जानो। हरिकी देह मिले पहिचाहो ॥
वे तो हैं परमेश्वर प्यारे। रहैं रामका बाना धारे ॥
जिनके दरशन पातक नासै। जनम मरनकी छूटैं गासैं ॥
किरपा कर निज भेद बतावैं। चौथेपद आनन्द दरसावैं ॥
ऐसे साधन कूं कहिं देखो। हरिसम जिनको जान बिसेखो ॥
साध बसैं जहां तुम मत जइयो। उनके सेवक कूं मत गहियो ॥
और साध जां जिस घरमाहीं। ह्वांभी तुमकूँ जाना नाहीं ॥३॥
दोहा ॥
साधन की सेवा करें, अरु चरणामृत लेह ।
तिनके भी मत जाइयो, जिनसे उनका नेह ॥ ४ ॥
नासकेतलीलावर्णन । ६३३
चौपाई ॥
और गिरस्ती ठाकुर सेवैं । माला फेर नाम हरि लेवैं ॥
राखैं बरत जागरण करैं । संध्यासमै आरती सरैं ॥
भोग लगाकर भोजन खावैं । और सन्तों को सीस नवावैं ॥
जिनके घर तुम कभी न जावो । अपनीसूरतनाहिंदिखावो ॥५॥
दोहा ॥
परमेश्वर के पारषद । उनकूं लेने जाहिं ।
तुमतो भूल न जाइयो, याद रखो मन माहिं ॥ ६
विष्णुभक्ति परभावकूं, अरु साधन की बात ।
चित्रगुप्त भी ना लखै, न्याव नहीं उन हाथ ॥७॥
चौपाई ॥
अरु इक नदी स्वर्ग के मांहीं । नाम पुहपका अधिक सुहाई ॥
सिध गंध्रब तानिकट बिराजै । देवत अरु धर्मातम राजै ॥
पुण्य बढ़त है नहाने सेती । तामें है सोने की रेती ॥
शंख पद्म ता माहिं भरेही । पुहुप भरे जहां वृक्ष खरेही ॥
दूध सुधासा जल है ताकै । ढेर मणों का कूल जुवाकै ॥
सूरज किरणों से अति दमकै । चन्द चांदनी सों वे चमकै ॥८॥
दोहा ॥
वाके तट इक बाग है, सुखका दैन सुथान ।
पवन सुगन्धी लिये जहां, बहत रहत सामान ॥ ६ ॥
चौपाई ॥
देखे तहां बिलास ही करते । बहुतभांति कर सुखही धरते ॥
भूख प्यास जाड़ा नहिं गर्मी । सदा निरोग रहें वहां धरमी ॥
बूढ़ा बाला ज्वान न दरसै । दुखकलेश हां कछू न परसै ॥
कष्ट तपस्या जो जग करई । भय अरु दुख वह कंहूं न भरई ॥
६३४ श्रीस्वामीचरणदासजीका ग्रन्थ ।
करैं किलोल हरष सुख पावैं । चरणदास जो स्वर्ग ही जावैं ॥
अरु पतिवर्ता फल बहु भोगे । संग पुरुष के जोगा जोगे ॥
इच्छा करत भोग जो आव । कहां लग कहूं बहुत सुखपावै ॥
पतिव्रता बहु नैन निहारी । शुभकर्मों के करने वारी ॥
अरु जो हैं विभिचारन नारी । उनपर विपत्ता देखी भारी ॥
जिनहूं की मैं कहूं सुनाई । दुराचारनी पति दुखदाई ॥१०॥
दोहा ॥
खोटा चित खोटे करम, पुरुष पराये साथ ।
चौरन जारन है घनी, जिनकी सुनों जो बात ॥११॥
चौपाई ॥
कलह सुहावै अति कंकाली । मैले मनकी अति जंजाली ॥
अपने पति कूं दोष लगावै । आन पुरुष सों चित मिलावै ॥
जलती रहै हिये के माहीं । या जगमें जस नेकहु नाहीं ॥
जब वह मरै पकड़ जम लेजाँ । उनकूं देह नरक दारुण माँ ॥
चौरासी वर्ष क्रोड जु ताहीं । हांसू तिन्हें निकासें नाहीं ॥
अष्ट धात के पुरुष बनाये । पावक सम वै अधिक तपाये ॥
जम कहै इनके संग मिलोही । जार तुम्हारे गलै लगोही ॥
मार मार कैही लपटावैं । जलते त्राह कहैं दुखपावैं ॥
अरु जो पापी नर हाँ जावैं । जम आज्ञा बहु पीड़ा पावै ॥
अरु जम यों कहैं पापी लोगो । खोटे कर्म किये अब भोगो ॥
रे मूरख ऐसा तन पाया । सो तुम पापहि माहिं गंवाया ॥
एक जनम के सुख के काजा । एककल्प भुगतौ नर्क साजा १२
दोहा ॥
बहुत दिनों तन ना रहै, जानत है सब कोय ।
पाप गाँठ बांधै घने, ये अपराधी लोय ॥ १३ ॥
नासकेतलीलावर्णन । ६३५
कलह लड़ाई करत हैं, औरनकूं दुख देत ।
ह्यां भी वे दुख पावहीं, नरकमाहिं दुख लेत ॥१४॥
पापी जीवन कूं कहैं, किंकर मारहिं मार ।
करम भौम दुर्लभ महा, जनम न बारंबार ॥१५॥
बोये ना शुभ करमहीं, अब लुनते सुख भोग ।
तें कीने खोटे करम, बड़ा लगाया रोग ॥१६॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने विष्णुभक्तिप्रभाववर्णनोनाम पंचदशोऽध्यायः ॥१५॥
नासकेत उवाच ॥
चौपाई ॥
स्वर्ग लोक इक और अनूठा । सो वह मृत्युलोक में डीठा ॥
वह भी बड़भागन सूं पावै । हरिकिरपा पुन्यसे बनआवै ॥१॥
दोहा ॥
अचरज मनुषा देहकूं, स्वर्ग लोकही जान ।
तामें आये होत है, परमेश्वर पहिचान ॥ २ ॥
चौपाई ॥
ऐसा स्वर्ग लोक नहिं दूजा । तामें आकै सब कुछ सूझा ॥
तामें भोगे भोग अपारा । तामें दीखै अति गुलजारा ॥
मूरख याका भेद न पाया । तामें सब ब्रह्माण्ड समाया ॥
तामें पावै ब्रह्म विचारै । तामें आकै तत्त्व निहारै ॥
जाके दीखै दस दरवाजे । तामें अनहद बाजे बाजे ॥
करम धरम बहुते तप कीन्हा । ताते हरिने नरतन दीना ॥
ऐसा पाया स्वर्ग गँवावैं । कलप कलप बहुते पछतावैं ॥
जो कोई ह्याँ सूं गिरजावैं । मनुषादेह बहुर नहिं पावैं ॥३॥
दोहा ॥
मनुषा देह अनूप की, कही चरनही 'दास ।