भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 662, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंनासकेतलीलावर्णन । ६१६
कही कि दैतन हम कूं मारा । नैक न माना हुकमतु म्हारा ॥
धरमराय सुन बहुत रिसाया । कालरूप कूं निकट बुलाया ॥
दोहा ॥
कहा कि वाहों के बली, इनके संग हां जाव ।
दानों सहित जुझूप कूं, मार पकड़ ले आव ॥ ६ ॥
चौपाई ॥
जम की आज्ञा ले वह काला । जै जै शब्द कहत उठ चाला ॥
वाके संग दूत घन चाले । अतिभैमान महाबिक्राले ॥
अपने अपने शस्तर तौलैं । चलौ चलौ आपस में बोलैं ॥
काल वही जिनका है नायक । पतितनकूं भारी दुखदायक ॥
खांडा है दहिने कर माहीं । चन्द्रहास तिह नांव कहाईं ॥
फांसी लिये जु बायें हाथा । ऐसें गया दूत ले साथा ॥
दूत काल के अरु वे दाने । जुद्ध करनलागे घमसाने ॥
मुगदर बज्जर लाठी मारैं । गदा जु फांसी सेल सँभारैं ॥७॥
दोहा ॥
खडग सिला पत्थर बड़े, अरु मुष्ठों की मार ।
दोऊ ओर से चलत है, तनकी नाहिं सँभार ॥ ८ ॥
चौपाई ॥
ऐसा जुद्ध करै न डरावैं । देखत रोम खड़े होजावैं ॥
अन्त यहीं दूतौ वे मारे । दैत्यों के नायक जो हारे ॥
और काल नैं डंडौ मारै । तड़फै बहुत धरन पै डारै ॥
मुगदर गदा मार बस लाये । बांध फांसियों पकड़ चलाये ॥
धरमराय के आगे कीने । तब राजा वै नीके चीन्हें ॥
फिर कही इनकूं लेकर धावो । चित्रगुसही पै ले जावो ॥
आयसु ले फिर ह्वांई आये । चित्रगुसकूं जाय दिखाये ॥