भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दोहा ॥
केलि करें स्वरग लोकमें, जिन किये ऐसे दान ।
जुदे जुदे चरनदास अब, ताको करै बखान ॥ ७ ॥
चौपाई ॥
जिन तलाव अरु कुएं खुदाये । बाट माहिं जिन दुरम लगाये ॥
अरु जिन ऐसे दत्तव कीने । बहुत दान विप्रन कूँ दीने ॥
सोना रूपा मंगे मोती । पन्ना हीरा उज्जवल जोती ॥
माणक चुन्नी और नगीना । दान जवाहरका जिन दीहा ॥
गहने भाड़े सिज्या दीनी । मन्दर भूमिदान जिन कीनी ॥
ताँबा और कपूर-सुहाये । अन्नदान भोजन जिन ख्वाये ॥
ऐसी बस्तें देने वारे । जाय बसत हैं स्वर्ग मंझारे ॥
पहिले धरमराय पै जावें । गण सुख सूं ले ले ही धावैं ॥८॥
दोहा ॥
खड़ा करें धर्मराय ढिग, कर-कर बहुती चाव ।
तब राजा ऐसें कहैं, स्वर्गलोक लेजाव ॥ ६ ॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने स्वर्गमार्गवर्णनोनाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
नासकेत उवाच ॥ दोहा ॥
अब स्वर्गों का कहत हूं, जुदा जुदाही नावैं ।
शुभकर्मन सूं पाइये, ऐसी उत्तम ठावैं ॥ १ ॥
पहिला स्वर्ग सुहावना, है कुबेर का लोक ।
यक्ष गन्धर्ब जहाँ अपसरा, भोगीम हा अशोक ॥ २ ॥
लोक बरुनकी छवि घनी, रतन जुड़े अस्थान ।
बाग घने शोभा घनी, बड़े सुखों की खान ॥ ३ ।
इन्दर की अमरावती, रही स्वर्ग छवि धार ।
नृत्य करत हैं अप्सरा, अधिकी जहाँ बहार ॥ ४ ॥