भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 673, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें६३० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
शुभ मग माहीं वृक्ष घनेही । सूरज तुल्य बिमान बनेही ॥
नदियां दूध सहत दधिघीकी । अरु मीठे जलही की नीकी ॥४॥
दोहा ॥
जहां पटंबर बादले, अरु वसनन की छांहिं ।
सूरज ही के लोककूँ, ह्यां होकर वे जाहिं ॥ ५ ॥
चौपाई ॥
जो सूरज के सेवक जानौं । सूरही लोक बसत मन आनौं ॥
सुखदाई जानौं वह लोका । जहां बसै कुछ रहै न शोका ॥
अरु बाजों के शब्द जहां है । गन्ध्रव लाखों रहत तहां है ॥
वस्तर भूपन पहिरै आवैं । गावैं नाचैं ताहि रिझावैं ॥६॥
दोहा ॥
जो सेवक महादेवके, पहुंचै वाके लोक ।
सुख सेती जहां रहत है, निर्भै अधिक असोक ॥ ७ ॥
चौपाई ॥
पर कन्या का ब्याह रचावैं । परमारथ के हेत करावैं ॥
विप्पर बालक देह जनेऊ । ऐसे कारज मैं चित देऊ ॥
अरु कोई ऐसा कारज आवै । परकारज को उठ उठ धावै ॥
स्वर्गलोक पावत है सोई । भावैं नर नारी क्यों न होई ॥
बिना दान शिवलोक न पावै । धरमहीन कैसे कर जावै ॥
रतन जड़े नाना छवि वाकी । सब शोभा वरनुं कहा जाकी ॥
जो ब्रह्मा के सेवक होई । वाके लोक बसत है सोई ॥
आनंद करै महा सुख पावै । ब्रह्मलोक को जो कोइजावै ॥
जो ब्राह्मण अपना धर्म राखै । करै सुकर्म झूठ नहिं भाखै ॥
वेदपाठ साधै षट करमन । संध्या गायत्री अरु तरपन ॥
ऋतुवन्ती नारी पै जावै । और दिना चित नाहिं लगावै ॥