भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६१६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जिन्हों पराई नारी मारी । अरु सतगुरकी निन्दा धारी ॥
धरमशास्त्र वेद पुरानी । इनहूं की निन्दाही ठानी ॥
तीरथ की निन्दा मुखलावै । सो सूचीमुख नरकही जावै ॥
नरकजु महाघोर इक नाऊं । सो विकराल भयानक ठाऊं ॥
तामें शूकर सिंह अरु कागा । रहें भेड़िया काले नागा ॥
जिसने पाप किये बहुभारी । सो जावे वा नरक मँझारी
करम कमाये खोटे खोटे । ऐसे पाप किये जिन मोटे ॥८॥
चौपाई ॥
जो कोइ बैठ बाट क माहीं । एक एक कूं देखत जाईं ॥
पर तिरिया की ओरी झांकैं । जिनकी कागे निकासत आंखैं ॥
जो कोइ बनमें आग लगावैं । जिनका मांस सिंघही खावैं ॥
जो कोई पापी गांवही जारै । तिनकी देह भेड़िया फाड़ै ॥
परघर कूं जो पावक लावै । शूकर जिनके हाथ चबावैं ॥
जाने विष देकर नर मारे । खावैं तोड नागही कारे ॥
ऐसे वाही नरक मँझारा । वे दुख पावैं अधिक अपारा ॥
चरनदास कहैं नासहीकेता । भाषत है जो कुछ हां देखा ॥६॥
दोहा ॥
शूलरूप , इक नरक है, शूली की ज्यों जान ।
पाप किये जिन राजमें, सोई गिरत है आन ॥१०॥
चौपाई ॥
मीरगन कूं जिन तीर चलाये । करी शिकार मारले आये ॥
नाहक नर शूलों पर दोये । हेत दरब के ताचन कोये ॥
जो वा नरक माहिं ले बासा । बहुती दीखै अधिकी त्रासा ॥
करमनका फल छूटै नांहीं । देखै अपनी आंखों हांहीं ॥११॥