भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनासकेतलीलावर्णन । ६३१
सब मनुष्यों से हित कर बोलैं । निंदा त्याग भली मुखखोलै ॥
शील दया हिरदै में धारैं । सो ब्रह्मा के लोक पधारैं ॥८॥
दोहा ॥
ज्यों क्षत्री धर्म आपने, सावधान जो होय ।
बस्ती की रक्षा करै, लोग दुखी नहिं कोय ॥ ६ ॥
चौपाई ॥
अपना अंश बांट कर लेवै । साध ब्राह्मण गऊ जु सेवै ॥
साधन की सेवा चित धरै । रनमें जूझै सनमुख मरै ॥
सोवै स्वर्गलोक कूं जावैं । भोगैं भोग बहुत सुख पावैं ॥
वैश्य शीलजुत गऊ चरावैं । साध ब्राह्मण कूं सिरनावैं ॥
बोलैं सांच बणज के माहीं । सत व्योपार झूठ कछु नाहीं ॥
शूदर अपने धर्म मंझारी । सांचे दयावन्त उपकारी ॥
सेवक गऊ बिरामन केरा । अपने गुरुका मनसों चेरा ॥
कोइ अतीत और गुरुभाई । सेवा कर बहुत चितलाई ॥
ऐसे चार बरन जो लेखे । चढ़े विमान जात मैं देखे ॥
और जिन्होंने लक्ष्मी धाई । लोक कामना पहुँचै जाई ॥१०॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने स्वर्गवर्णनोनाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
नासकेत उवाच ॥ चौपाई ॥
जिस जिस देवतकूं कोई धावैं । ताके लोकमाहिं वह जावैं ॥
ठाकुर का कोई भक्ता लसैं । वाके लोकमाहिं जा बसैं ॥
करै विनोद महासुख भारी । कै हो पुरुष और कै नारी ॥
दियाजिन्हों दधि दूध मिठाई । भोजन दिये महा सुखदाई ॥
दिया घीव रस सोना रूपा । छायाकरी हरी जिन धूपा ॥
मोती माणक गुली कपूरा । दिये दान जिन बस्तर पूरा ॥
बहुबिध दान करैं जो केता । तीरथ बर्त करें अरु जेता ॥