भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 666, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंनासकेतलीलावर्णन । ६२३
किरपा कर कर सबही कहिये । हम कूं भी ह्यां कीया चहिये॥
नासकेत उवाच ॥ चौपाई ॥
नासकेत जब वचन उचारा । सो सो कहूं जु नैन निहारा ॥
जगमें सील दयाही सुखिया । पुण्यदान सू होवै सुखिया ॥
जो नर इनसेती चितलावैं । बाट माहिं बहुतै सुखपावैं ॥
कोयल राह बिरछ बहु फले । महा सुगन्ध छांहिं उनतले ॥
फलखाने कूं मारग माहीं । चढ़े बिमानन ऊपर जाई ॥
मनुषा जनमपाय जिन कीन्हा । जीवत दान कछू ह्यां दीन्हा ॥
आय मिलत हैं मारग माहीं । सुख आनन्द सूँ खाते जाई ॥
जिन जीवों ऐसे पुन कीन्हे । दूध दही घृत दिये नवीने ॥ ३ ॥
दोहा ॥
नाना भांत मिठाइयां, अरु मेवा दई जान ।
नाना विध भोजन दिये, सोई मिलत हैं आन ॥ ४ ॥
जो कछु करै सो आपकूं, परकूँ करै न कोय ।
अपना कीया पाय है, नीच ऊँच क्यों न होय ॥ ५ ॥
चौपाई ॥
आगे बाजे बजते जावैं । हरिजस अधिक नायका गावैं॥
ऐसैं जावैं स्वरग मंझारै । लैन अप्सरा आवैं द्वारै ॥
निरत करत भीतर लेजावैं । सिंहासन ऊपर बैठावैं ॥
धरम नीक कूं देखें कोई । उठ उठ आन मिलत है सोई ॥
बहुतक जहां अप्सरा नारी । दिव बस्तर दिव भूषन वारी ॥
चोवा चन्दन कोई लगावै । कोई चावसों पवन दुरावै ।
कहै कै हमतो तुमरी दासी । हम तुम रहें सदाही पासी ॥
एक साथ मिल हरिगुन गावैं । करें विलास परम सुखपावैं॥६॥