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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 669

६२६ स्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दोहा ॥
भूमि गऊ अरु हेमका, और बसन दे दान ।
सो वे धरम प्रभावते, रहैं स्वर्ग सुखमान ॥ १४ ॥
चौपाई ॥
आनन्द करते देखे भाश । कहूँ जो अपने नैन निहारा ॥
जिन नर गुर की सेवा करिया । हरिकी पूजा मनमें धरिया ॥
मात पिता का सेवन कीना । जथाशक्ति कछु दान जु दीना ।
कन्द मूल फल अन्न जु दीया । विप्रसाध का आदर कीया ॥
हरषमान भोजन जो खवाया । चलती बारी शीस नवाया ॥
तब वह दान बिरध हो फलैं । सोई आय प्रानी कूं मिलैं ॥
सुख पावै तुष्ट आनन्दा । जो कोई बोवै धर्म का कन्दा ॥
जो कोई पुन्यदान ह्यां देवै । कुबेर लोक जाका फल लेवै ॥ १५ ॥
दोहा ॥
कियो अगनहोत्र सदा, कियो जज्ञ अरु दान ।
कामलालसा ना कियो, जती रहै बेजान ॥ १६ ॥
चौपाई ॥
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