भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 660, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंनासकेतलीलावर्णन । ६१७
दोहा ॥
और नरक है चौदवां, नांव अगन ही कुण्ड ।
ताहि लखै हियरा डरै, तप्त महा प्रचण्ड ॥१२॥
चौपाई ॥
पापी प्रानी कूं हां डारै । पड़ै नाहिं तो जम बहु मारै ॥
कहै पापी मैं बहुत पियासा । जल प्याकै फिर देवो त्रासा ॥
दूत कहैं सुन रे मतहीना । तैंतो दया धरम नहि चीन्हा ॥
जनमपाय यह भी नहिं कीना । काहू कूं जलदान न दीना ॥
जैंवत ग्रास न दीया पापी । नेवज की रोटी नहीं थापी ॥
ब्राह्मण कबहूँ नाहि जिमाया । गुरभाई को नाहिं खवाया ॥
अगन माहिं आहूत न जानी । भूखे कूं दिया अन्न न पानी ॥
धृग धृग रे मूरख नरलोई । अपना किया भुगत अबसोई ॥
बिन भुगतैं छुटकारा नाहीं । क्यों नहिं गिरता याके माहीं ॥
अब तुम अगन कुण्ड कूं झेलो । कोई न संगी भुगत अकेलो ॥१३॥
दोहा ॥
गहन जु सूरज चन्दका, तामें किया न दान ।
पेटभरा ज्यों बैल सम, करी न पुण्य पहिचान ॥१४॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने नरकवर्णनोनाम दशमोऽध्यायः॥ १० ॥
नासकेत उवाच ॥ चौपाई ॥
नरक तेल जंत्र इक नाऊं । कोल्हू सूरत ताहि सुनाऊं ॥
तामें पतित गिरत हैं जाई । करम किये ए लोग लुगाई ॥
जो कोई चोरी निन्दा करै । भूमि पराई लेत न डरै ॥
खेत बिराना मूसै चलिकै । परतिरिया कूँ छीनै बलकै ॥
सोतो तेल जंत्र के माहीं । पिलपिल पापी बहु दुख पाहीं ॥