भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 663, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें६२० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चित्रगुप्त ने किया बिचारी । बड़ पापी हैं येसब भारी ॥९॥
दोहा ॥
दूतोंने जतनों सहित, बांधा सावहीधान ।
भाग न जावैं छूटकै, बलवन्ते परवान ॥१०॥
चौपाई ॥
फिर वे नरकमाहिं डलवाये । इनकूं बहुते त्रास दिखाये ॥
ह्वांसूं काढ़ें बहुतीबारा । फिर दें अगन कुण्डमें डारा ॥
ऐसे दैतन कूं भी देखा । पाप पुन्यका देवै लेखा ॥
तातें सुनों ऋषी परबीना । रहै नहीं धनवंता हीना ॥
ना रहै बली न बूढ़ा बारा । काल सभी का खानेवारा ॥
कै घरमें कै बनके माहीं । काल कहीं छोड़त है नाहीं ॥
काल वली की फिरै दुहाई । कोइ न छोड़ा रंक अरु राई ॥
ना कोई संगी ना कोई साथी । बहुतोंगहिगहि छोड़ी बाथी ११
दोहा ॥
तातें या संसार में, चित्त न लावो कोय ।
यह निहचै कर जानलो, अपना कोई न होय ॥१२॥
चौपाई ॥
मूये पाछै काकूं रोवैं । सुपना सा देखें जब सोवैं ॥
जब जागें जब कोइ न कोई । ऐसी भांती जग यह होई ॥
छोटी बड़ी आरबल जानौ । यह सब काल चरित्र मानौ ॥
ब्याधरोग में यह को परै । काल खेल यह सबही करै ॥
सबही सृष्ट कालमुख माहीं । कोट जतन सूं बचै जु नाहीं ॥
इसी जगत का ऐसा लेखा । ज्यों स्वांगी धर नाचै भेखा ॥
जैसे बाट बटेऊ जावैं । छांहि वृक्षकी टुक ठहरावैं ॥
फिर वह धूप माहि ही धावै । जबलगनाहि ठिकाना पावै १३