भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 672, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंनासकेतलीलावर्णन । ६२६
नासकेतउवाच ॥ दोहा ॥
ब्रह्मभोज जो देत हैं, जज्ञ करें चितलाय ।
और तपस्या करत हैं, अपने तनको ताय ॥ १ ॥
चौपाई ॥
जेठ मास पंच अगनी तापैं । चार ओरही पावक आपैं ॥
पँचवीं अगन सीसपर आना । यह पँच अगनी लेह पिछाना ॥
पूस माह में ऐसे धारे । सहस धार के लेने वारे ॥
टिगटी पर मटका धरवावैं । सहस छेद तामें करवावैं ॥
जल भरवा तल बैठें सोई । ऐसा कष्ट करै जो कोई ॥
सो वे रतन जड़े घर पावैं । सोमलोक में बहु हुलसावैं ॥२॥
दोहा ॥
सोनेका जो दान दे, सूरलोक कूं जाय ।
अरु कपड़े का जो करैं, वाही लोक रहाय ॥ ३ ॥
चौपाई ॥
आसोज अरु कातिक जब आवैं । तिनमें विप्रन कूं भुगतावैं ॥
खीर खांड भोजन करवावैं । साध ब्राह्मण नोत जिमावैं ॥
दक्षिणा दे टीका जब काढैं । वाका धर्म अधिकही बाढैं ॥
पौह माहं दे लकड़ी दाना । बहु बिधदेह जडावल नाना ॥
बैशाख चैत ऐसा जिन कीया । अन्नदान मंगतों कूं दीया ॥
जेठ साढ़ जिन पानी प्याये । गोरस दान दिये मनभाये ॥
ते जिय जावैं स्वर्ग मंझारी । आनन्द पावैं अधिक अपारी ॥
दानदिये फल आगे आवैं । नाना भोगकरैं सुख पावैं ॥
जिन पति संग जलाई काया । याहूका फल अधिक बताया ॥
साठ किरोड़ बरष वह नारी । रहै सुरके लोक मंझारी ॥
सो वह दिव मारग कँ पावै । पति सूँ कर जोरे ही जाव ॥
२