भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनासकेतलीलावर्णन । ६३३
चौपाई ॥
और गिरस्ती ठाकुर सेवैं । माला फेर नाम हरि लेवैं ॥
राखैं बरत जागरण करैं । संध्यासमै आरती सरैं ॥
भोग लगाकर भोजन खावैं । और सन्तों को सीस नवावैं ॥
जिनके घर तुम कभी न जावो । अपनीसूरतनाहिंदिखावो ॥५॥
दोहा ॥
परमेश्वर के पारषद । उनकूं लेने जाहिं ।
तुमतो भूल न जाइयो, याद रखो मन माहिं ॥ ६
विष्णुभक्ति परभावकूं, अरु साधन की बात ।
चित्रगुप्त भी ना लखै, न्याव नहीं उन हाथ ॥७॥
चौपाई ॥
अरु इक नदी स्वर्ग के मांहीं । नाम पुहपका अधिक सुहाई ॥
सिध गंध्रब तानिकट बिराजै । देवत अरु धर्मातम राजै ॥
पुण्य बढ़त है नहाने सेती । तामें है सोने की रेती ॥
शंख पद्म ता माहिं भरेही । पुहुप भरे जहां वृक्ष खरेही ॥
दूध सुधासा जल है ताकै । ढेर मणों का कूल जुवाकै ॥
सूरज किरणों से अति दमकै । चन्द चांदनी सों वे चमकै ॥८॥
दोहा ॥
वाके तट इक बाग है, सुखका दैन सुथान ।
पवन सुगन्धी लिये जहां, बहत रहत सामान ॥ ६ ॥
चौपाई ॥
देखे तहां बिलास ही करते । बहुतभांति कर सुखही धरते ॥
भूख प्यास जाड़ा नहिं गर्मी । सदा निरोग रहें वहां धरमी ॥
बूढ़ा बाला ज्वान न दरसै । दुखकलेश हां कछू न परसै ॥
कष्ट तपस्या जो जग करई । भय अरु दुख वह कंहूं न भरई ॥