सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 675, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 675

६३२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जाका फल मनमें नहिं धरै। सब ठाकुर कूं अरपन करै ॥
दान करै हरि के हित बोवै। सो बैकुंठ परापति होवै ॥
तातें अपनो भला करीजै। धर्मपंथ में सदा रहीजै।
गुरू ब्राह्मण कूं जो मानै। जो गृहस्थ कूं बेद बखानै ॥
जो गृहस्थ के साधू आवै। देखत उठकै सीस नवावै ॥
आदर आसन दे बैठारै। मुखसूं मीठे बचन उचारै ॥
जथाशक्त भोजन करवावै। कंदमूल जैसा घर पावै ॥
जिन साधोंका सेवन चीन्हा। देवत पित्तर पूजन कीन्हा ॥
साध समान जगत के माहीं। और धरम कोइ दीखै नाहीं ॥
जिनकी अस्तुति राम बखानी। बेद पुरानन में हो जानी ॥१॥
दोहा ॥
एक समय धरमराय सब, लीने दूत बुलाय ।
कहा कि तिरलोकी बिषै, हरिजन हैं अधिकाय ॥ २ ॥
चौपाई॥
एक बात यह जाने रहियो। मेरा कहा जो नीकै लहियो ॥
साधुरूप कूं ऐसे जानो। हरिकी देह मिले पहिचाहो ॥
वे तो हैं परमेश्वर प्यारे। रहैं रामका बाना धारे ॥
जिनके दरशन पातक नासै। जनम मरनकी छूटैं गासैं ॥
किरपा कर निज भेद बतावैं। चौथेपद आनन्द दरसावैं ॥
ऐसे साधन कूं कहिं देखो। हरिसम जिनको जान बिसेखो ॥
साध बसैं जहां तुम मत जइयो। उनके सेवक कूं मत गहियो ॥
और साध जां जिस घरमाहीं। ह्वांभी तुमकूँ जाना नाहीं ॥३॥
दोहा ॥
साधन की सेवा करें, अरु चरणामृत लेह ।
तिनके भी मत जाइयो, जिनसे उनका नेह ॥ ४ ॥