भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६३२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जाका फल मनमें नहिं धरै। सब ठाकुर कूं अरपन करै ॥
दान करै हरि के हित बोवै। सो बैकुंठ परापति होवै ॥
तातें अपनो भला करीजै। धर्मपंथ में सदा रहीजै।
गुरू ब्राह्मण कूं जो मानै। जो गृहस्थ कूं बेद बखानै ॥
जो गृहस्थ के साधू आवै। देखत उठकै सीस नवावै ॥
आदर आसन दे बैठारै। मुखसूं मीठे बचन उचारै ॥
जथाशक्त भोजन करवावै। कंदमूल जैसा घर पावै ॥
जिन साधोंका सेवन चीन्हा। देवत पित्तर पूजन कीन्हा ॥
साध समान जगत के माहीं। और धरम कोइ दीखै नाहीं ॥
जिनकी अस्तुति राम बखानी। बेद पुरानन में हो जानी ॥१॥
दोहा ॥
एक समय धरमराय सब, लीने दूत बुलाय ।
कहा कि तिरलोकी बिषै, हरिजन हैं अधिकाय ॥ २ ॥
चौपाई॥
एक बात यह जाने रहियो। मेरा कहा जो नीकै लहियो ॥
साधुरूप कूं ऐसे जानो। हरिकी देह मिले पहिचाहो ॥
वे तो हैं परमेश्वर प्यारे। रहैं रामका बाना धारे ॥
जिनके दरशन पातक नासै। जनम मरनकी छूटैं गासैं ॥
किरपा कर निज भेद बतावैं। चौथेपद आनन्द दरसावैं ॥
ऐसे साधन कूं कहिं देखो। हरिसम जिनको जान बिसेखो ॥
साध बसैं जहां तुम मत जइयो। उनके सेवक कूं मत गहियो ॥
और साध जां जिस घरमाहीं। ह्वांभी तुमकूँ जाना नाहीं ॥३॥
दोहा ॥
साधन की सेवा करें, अरु चरणामृत लेह ।
तिनके भी मत जाइयो, जिनसे उनका नेह ॥ ४ ॥