भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनासकेतलीलावर्णन ६२१
दोहा ॥
थोड़ा सुख संसारका, तामें दुःख अपार ।
चित मत दोजो तासमैं, मैं कहूँ बारम्बार ॥ १४ ॥
चौपाई ॥
साध संगत गुरचरन मनावो । तातें काल चपेट न खावो ॥
हरि की ओरी चित्त लगावो । यातें मुक्ति ठिकाना पावो॥१५॥
दोहा ॥
नरक विलोचन अब कहूँ, सो अठारवां जान ।
वे पापी वहां परत हैं, जिनकी दिष्टकुध्यान ॥ १६ ॥
चौपाई ॥
राह चलत तहिं जीव निहारैं । बाजे देखे तो बीमारैं ॥
परतिरिया जो देखत जावै । करै मनोरथ बहुत लुभावै ॥
क्रोधदिष्ट साधन कूं देखै । तिनकी निन्दा करै बसेसै ॥
देख किसीका पड़दा खोलैं । बिषै तमासे ही में डोलैं ॥
साध गुरू की ओर न झांकै । ठाकुरद्वारे प्रीति न राखै ॥
विधवा नारी काजल आंजै । आन पुरुषही के वै काजै ॥
ऐसे जो हो लोग लुगाई । तिन्हें नरक यह अतिदुखदाई ॥
गिरतैं बिन आंखन होजावैं । चीसैं बहुत महादुख पावैं ॥
रणजीत कहैं उन नैन निहारा । कहा ऋषिनसूं लखि विस्तारा॥
और अनूठा नरक बताऊं । सो पिरथी ऊपर दिखलाऊं १७॥
दोहा ॥
सो याही मृत्युलोक में, देखा अपने नैन ।
यह परगट प्रतिक्ष है, पापी कूं दुख दैन ॥१८॥
चौपाई ॥
जगमें नरक कहूँ अब खोलैं । महा कंगाल मांगते डोलैं ॥