भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनासकेतलीलावर्णन । ६२५
रोग बुढ़ापा भय न हां, जो कोइ पहुँचे जाय ।
रतन जड़े मन्दिर मिलें, भोगैं भोग अघाय ॥ ५ ॥
सोमलोक में सुख घना, पावै अति ही चैन ।
रनजीत कहैं वहाँ जाय 'कर, देखे अपने नैन ॥ ६ ॥
आदित्य लोक में भोग है, नाना विधि सुखदान ।
दिव्य देही पावै जहाँ, अधिकी रूप निदान ॥ ७ ॥
शिवका लोक सुहावना, शोभा कही न जाय ।
जो जैसी इच्छा करै, तैसा ही फल पाय ॥ ८ ॥
सभा मुनिन-की ललित है, तीरथ मूरत धार ।
सब परबत देही धरैं, घनी अप्सरा नार ॥ ६ ॥
ब्रह्मलोक सबसे बड़ा, तेजवन्त अधिकाय ।
अति उज्ज्वल निर्मल महा, दृष्टि नहीं ठहराय ॥ १० ॥
दमकैं मन्दिर रतन के, नाना विध के भोग ।
वही बसैं वहाँ जायकै, जो साधै तप जोग ॥ ११ ॥
सात स्वर्ग बरनन करे, सूक्ष्म कहे जनाय ।
जिस करनी सों जाय वहां, सो अब कहूँ सुनाय ॥ १२ ॥
चौपाई ॥
सुनो ऋषीश्वर सबै सुनाऊं । धर्मिष्ठों के भोग बताऊं ॥
धर्मी पुरुष बसत जा ठाईं । नाना सुख आनन्द तहां ही ॥
दूध दही घृत अरु पकवाना । सहत जहाँ मेवा है नाना ॥
दिव्य गहने जहाँ रतन जड़ाऊ । रेशम बस्तर अधिक सुहाऊ ॥
जहाँ अप्सरा सेव करत हैं । आज्ञा माहीं खड़ी रहत हैं ॥
अद्भुत बाजे बहुत बजत हैं । महा विनोदा तहाँ रजत हैं ॥
जो कोई कूर्वां ताल खिनावै । और बावड़ी बाग बनावै ॥
सुरग माहिं वह आनन्द पावै । बहुतकालमृत्युलोक न आवै॥१३॥