भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६१८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
दुखद सोलवां वा भुगतावै। घीव तेल ज्यों मनुष चुरावै ॥
भक्ति छुटावै निगुरा करै। झूठे अवगुन काहू धरै ॥
वाकूँ तेल कड़ाहे तलैं। अपने नैनन देखै भलैं ॥
मदिरा अचवैं आमिष खावैं। तिनकूँ ताता तेल पिलावैं ॥
नरक सतरवां लेहु पिछाना अन्धकारज्योंकरूं बखाना ॥१॥
दोहा ॥
जो राकस वै जीव हैं, बड़ी आरबल देह ।
तन ऊंचा बल है घना, तहाँ परत हैं वेह ॥२॥
चौपाई॥
सुनौं कहूँ जो कुछ हां देखा। सो तुमसँ राखूँ नहिं नेका ॥
अस्थान कालका एक निहारा। जो मनुषों का करै संहारा ॥
महाभयानक वह अस्थाना। बड़े कष्ट सूं हो हां जाना ॥
देखा दूत एक हां भारी। जाका तन मोटा बलकारी ॥
दहने करमें दण्ड जु वांकै। बावैं में फांसी है जाकै ॥
आंखें रकत रूप बिकरारा। अरु भैंसे पर है असवारा ॥
अरु जो किंकर है वा पासा। उनका भी तनकालहीकासा॥३॥
दोहा ॥
और नाम किरतांत है, उसी काल का जान ।
अरु जो वाके दूत हैं, सो किरतांत पिछान ॥ ४ ॥
चौपाई ॥
एक समय वह धरमही राजा । अपने दूतन सूं कहो काजा ॥
अज्ञा ले जमदूत पधारे । दैतराज देखा तन भारे ॥
दूतन शस्तर तहाँ चलाये। दैतराज वै मार भगाये ॥
अरु दैतों ने बहुतक कूटे। भई लराई शस्तर टूटे ॥
धरमराय पै भागै आये। हां के कौतुक सबै सुनाये ॥