भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
देही दिव्य रूप धरि रहिया । सुन्दर एक विमान जु लहिया ॥
रतन जड़े घर माहिं बिराजैं । आठो सिद्धि खड़ी छबि छाजैं ॥
शील बरत में सांची नारी । पति की आज्ञा कबहुँ न टारी ॥
तिरदेवा सूं अपने पति कूं । अधिक जानती है वह हित सूं ॥
परपति के वह जाय न नीरा । सबकूं जानै बाप अरु बीरा ॥
अन्यपुरुष के छुवे न मोती । अपने पति की पहिरे पोती ॥
तिरलोकी जाकूं सिरनावै । जहां तहां वह अस्तुति पावै ॥
स्वर्ग माहिं सुख लेने वारी । शुभ लक्षण सब बात सँवारी ॥
पति के संग लगीही रहै । काहू से पिया की नहि कहै ॥
दुख विपता में संग नहि छाड़ैं । अपने पतिही सूं हितमांडै ॥
बुरा भला पति कूं नहिं जानै । हरिही की सम ताहि पिछानै ॥
बुरी भली आज्ञा जो करै । सबही माने नैक न टरै ॥
कोढ़ी अँधरा जो पति वाका । चितसूँ सेवन करै जो ताका ॥
पुरुष मरै जावै जग सेती । वाके संग जलै कर हेती ॥
पति कूँ कष्ट होय दुख मानै । वाका सभी आपना जानै॥२३॥
दोहा ॥
शुभकर्मी भर्ता भवै, कै षट कर्म करै ॥
मान भंग नहीं करै, सेवा चित्त धरै ॥ २४ ॥
चौपाई ॥
भर्ता पुन्य करै सुख मानै । पाप करै जब दुख हिये आनै ॥
ऐसे कर्म करै। जो नारी । पति समेत जा स्वर्ग मंझारी ॥
इन्द्रलोक में जाय बिराजै । सहस चौकड़ी लों वहाँ राजै ॥
रतन जड़े भूषन रहें पहिरें । मुतियन के हिये हार जुलहरैं ॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने स्वर्गवर्णनो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥