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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 670

नासकेतलीलावर्णन । ६२७
दोहा ॥
पनही नांगे देत है, प्यासे पानी देत ।
चरणदास यों कहत हैं, फल पावन के हेत ॥ १८ ॥
चौपाई ॥
भांड़े वस्तर घोड़े हाथी । गौवें देवे बच्छो साथी ॥
देवे ऊँट पलाने साजैं । सो जो इन्दर लोक विराजै ॥
बहुतक भोग करै वरठाई । रथ विमान चढ़ि रमै तहांहीं ॥
मोर लगे काहू रथ साथा । हंस लगे काहू विख्याता ॥
कैयों के हाथी अरु घोड़े । कैयों के सारस के जोड़े ॥
अपने धरम दान के कीये । देवत होय स्वरग सुख लीये ॥
देवसुता बहु सेवा करें । धरमनीक कों हित बहु धरें ॥
जिनका रूप जानिये ऐसा । अगन तपा सोना है जैसा ॥
शुद्ध फटक ज्यों निर्मल देहा । रतन जटित हैं जिनके गेहा ॥
कंठ माहिं रतनों की माला । महारूप धारै वे बाला ॥१९॥
दोहा ॥
वाजे सुघड़ बजावहीं, निरते अति चतुराय ।
धरमनिकों के कारने, अस्थापी धरमराय ॥ २० ॥
हां जो है धर्मात्मा, चढ़े विमानों देख ।
जहां इच्छा तहां जात हैं, क्रीड़ा करें अनेक ॥ २१ ॥
अन्नदान के किये तें, पावें अमृत भोग ।
तातें सबही नरनकूं, दानही देना जोग ॥ २२ ॥
चौपाई ॥
जो नारी ऐसा प्रण धारै । पतिव्रता हो धर्म सँभारै ॥
पहिले सर्व कुटुंब को खवावै । पीछे बचा आपहू खावैं ॥
अरु अपने पति कूं नित सेवे । सो वह इन्द्रलोक फल लेवे ॥