भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 677, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें६३४ श्रीस्वामीचरणदासजीका ग्रन्थ ।
करैं किलोल हरष सुख पावैं । चरणदास जो स्वर्ग ही जावैं ॥
अरु पतिवर्ता फल बहु भोगे । संग पुरुष के जोगा जोगे ॥
इच्छा करत भोग जो आव । कहां लग कहूं बहुत सुखपावै ॥
पतिव्रता बहु नैन निहारी । शुभकर्मों के करने वारी ॥
अरु जो हैं विभिचारन नारी । उनपर विपत्ता देखी भारी ॥
जिनहूं की मैं कहूं सुनाई । दुराचारनी पति दुखदाई ॥१०॥
दोहा ॥
खोटा चित खोटे करम, पुरुष पराये साथ ।
चौरन जारन है घनी, जिनकी सुनों जो बात ॥११॥
चौपाई ॥
कलह सुहावै अति कंकाली । मैले मनकी अति जंजाली ॥
अपने पति कूं दोष लगावै । आन पुरुष सों चित मिलावै ॥
जलती रहै हिये के माहीं । या जगमें जस नेकहु नाहीं ॥
जब वह मरै पकड़ जम लेजाँ । उनकूं देह नरक दारुण माँ ॥
चौरासी वर्ष क्रोड जु ताहीं । हांसू तिन्हें निकासें नाहीं ॥
अष्ट धात के पुरुष बनाये । पावक सम वै अधिक तपाये ॥
जम कहै इनके संग मिलोही । जार तुम्हारे गलै लगोही ॥
मार मार कैही लपटावैं । जलते त्राह कहैं दुखपावैं ॥
अरु जो पापी नर हाँ जावैं । जम आज्ञा बहु पीड़ा पावै ॥
अरु जम यों कहैं पापी लोगो । खोटे कर्म किये अब भोगो ॥
रे मूरख ऐसा तन पाया । सो तुम पापहि माहिं गंवाया ॥
एक जनम के सुख के काजा । एककल्प भुगतौ नर्क साजा १२
दोहा ॥
बहुत दिनों तन ना रहै, जानत है सब कोय ।
पाप गाँठ बांधै घने, ये अपराधी लोय ॥ १३ ॥