भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 665, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें६२२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
नागे भूखे और जडाये। जूताना जिनके ही पाये॥
पेट भरन कूं जतन करत हैं। बहुत पचैं ना उदर भरत हैं॥
हैं दारिद्री नितही रोगी। अंधरे कोढ़ी निसदिन सोगी॥
ऐसे देखो जो नर नारी। सब कूं जानौं नरक मंझारी॥
जो कोइ पड़े बंध के माहीं। जीवत नरक मांहिं भुगताईं॥
खोटा करतैं नाहिं डरावैं। जिन कूं प्यादे जम लेजावैं॥
औगुनगारे कूं बहु मारैं। पाछै जकड़ बंध में डारैं॥१९॥
दोहा॥
निरख परख निहचै करो, मन में लीजै जान।
अपनी आंखों देख लो, मैं जो किया बखान॥२०॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने यमशासनो नाम एकादशोऽध्यायः॥११॥
ऋषिरुवाच॥ चौपाई॥
कह ऋषीश्वर सुनहो दाता। नासकेत तुम परमगियाता॥
जगमें बसना दीखै ऐसा। रैन समै बृक्षपक्षी जैसा॥
राह माहिं ज्यों थका बटाऊं। बैठ छाहिं फिर चलै उठाऊं॥
आवा गवन यों जगत मंझारा। हमकूं डर लागत है भारा॥
तू जमलोक देखकर आया। हमकूं ऐसा ज्ञान दिढाया॥
अब इक बात पूछत है औरी। सभी ऋषीश्वर दोउ करजोरी॥
याका उत्तर हम कूं दीजे। हमें सनाथ आज तुम कीजे॥
सबै पापका फल दिखलाया। सो सब हमरे निहचै आया॥१॥
दोहा॥
पुन्य करन के फलन को, अब तुम कहो विचार।
जो जो देखो नैनही, सुखपावत नरनार॥२॥
चौपाई॥
जो ये लोग दान पुन्य करैं। फलपावैं कहा जब यह मरैं॥