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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 678, कुल 690 में से

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पृष्ठ 678

नासकेतलीलावर्णन । ६३५
कलह लड़ाई करत हैं, औरनकूं दुख देत ।
ह्यां भी वे दुख पावहीं, नरकमाहिं दुख लेत ॥१४॥
पापी जीवन कूं कहैं, किंकर मारहिं मार ।
करम भौम दुर्लभ महा, जनम न बारंबार ॥१५॥
बोये ना शुभ करमहीं, अब लुनते सुख भोग ।
तें कीने खोटे करम, बड़ा लगाया रोग ॥१६॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने विष्णुभक्तिप्रभाववर्णनोनाम पंचदशोऽध्यायः ॥१५॥
नासकेत उवाच ॥
चौपाई ॥
स्वर्ग लोक इक और अनूठा । सो वह मृत्युलोक में डीठा ॥
वह भी बड़भागन सूं पावै । हरिकिरपा पुन्यसे बनआवै ॥१॥
दोहा ॥
अचरज मनुषा देहकूं, स्वर्ग लोकही जान ।
तामें आये होत है, परमेश्वर पहिचान ॥ २ ॥
चौपाई ॥
ऐसा स्वर्ग लोक नहिं दूजा । तामें आकै सब कुछ सूझा ॥
तामें भोगे भोग अपारा । तामें दीखै अति गुलजारा ॥
मूरख याका भेद न पाया । तामें सब ब्रह्माण्ड समाया ॥
तामें पावै ब्रह्म विचारै । तामें आकै तत्त्व निहारै ॥
जाके दीखै दस दरवाजे । तामें अनहद बाजे बाजे ॥
करम धरम बहुते तप कीन्हा । ताते हरिने नरतन दीना ॥
ऐसा पाया स्वर्ग गँवावैं । कलप कलप बहुते पछतावैं ॥
जो कोई ह्याँ सूं गिरजावैं । मनुषादेह बहुर नहिं पावैं ॥३॥
दोहा ॥
मनुषा देह अनूप की, कही चरनही 'दास ।