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भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

नासकेतलीलावर्णन । ६०५
साथ अप्सरा हरि गुणगावैं । करत कीरतन ही ले जावैं ॥६॥
दोहा ॥
पूरबद्वारे की कही, सुनों ऋषीश्वर चैन ।
पच्छिम द्वारा अब कहूं, सोभी है सुख दैन ॥१०॥
चौपाई ॥
जिन मात पिताकी आज्ञामानी । पर निन्दा कबहू नहीं ठानी ॥
नित्त प्रति कुछ कीया दाना । परधन कूं विंष्ठा सम जाना ॥
काम क्रोध जिनके नहीं मोहा । काहूँ सें राखै नहिं द्रोहा ॥
परतिरिया मनमें नहीं लीनी । नारायन की पूजा कीनी ॥
वे पच्छिम द्वारे हो जावैं । अपने लक्षन सूं सुखपावैं ॥
द्वार तीसरे की सुन बाता । सभी सुनाऊं ताकी काथा ॥
जो प्रानी है पर उपकारी । पर कारजहित दुखसहैं भारी ॥
अपने कारज ढील लगावैं । पर कारज कूँ उठ उठ धावैं ॥
आपन दुखसह पर सुख दीना । जीवत परमारथही कीना ॥
आप धर्म कर और करावैं । हिरदय दया नाम चितलावैं ॥
सो जावैं उत्तरही द्वारै । साधरूप गण तिनके लारै॥११॥
दोहा ॥
विष्णु भक्ति की नेष्ठा, साध विप्र की सेव ।
धर्म बरत में डिढ रहै, सिरपर रख गुरुदेव ॥१२॥
चौपाई ॥
अरुभलेकर्म जिन कीने नाहीं । खोटे कर्मन के पडमाहीं ॥
सो चौथे द्वारे हो जावैं । बाटमाहिं जम बहुत सतावैं ॥
पाप किये जिन ऐसे ऐसे । सबही खोल बताऊं तैसे ॥
दुष्टबड़े तनमन दुखदाई । सब जीवन सूं करै बुराई ॥

६०६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चौपाये कूं बहुतै मारै । छिपकर परघरही कूं जारै ॥
पक्षी पकड़ फन्द में डारै । जीव हतन की मन में धारै ॥
हरे बिरछ कूं जो वे काटैं । अरु चोरीकर लूटत बाटैं ॥
गऊ ब्राह्मण की कर घातैं । मात पिता सूं टेढ़ी बातैं ॥१३॥
दोहा ॥
जार करम हित सूं करै, गरभ गिरावै जान ।
पर निन्दा बहुती करैं महा मूढ़ अज्ञान ॥ १४ ॥
चौपाई ॥
और वै हैं विस्वासी घाती । बोलैं झूठ महा अपराधी ॥
झूठी साख भरै न लजावैं । परघरही सूं धन ठगलावैं ॥
जाका नोन खाय वा मारै । रस्ते मांहि आगहू डारै ॥
खुशी होय परकी कर हांसी । मनमें राखै सब सूं गांसी ॥
डिभ कपट छल भगल अहारा । जो कुछ किया सो नांहि विचारा ॥
साधसंग में मन नहिं दीन्हा । गुरुका कहा पंथ नहिं चीन्हा ॥
बेमुख हो आवना त्यागैं । दुनियां के दुख धंधे पागैं ॥
वेद पुरानन कों नहिं मानैं । शास्त्र की निन्दाही ठानैं ॥
पाप अनेक करत नहिं डरैं । मनमें पाप पाप धुन धरैं ॥
औगुन ग्राही गुन नहिं पकड़ैं । दीन होय जासों बहु अकड़ैं ॥
धरमजु अपने स्वामी केरा । ताकी निन्दा करै घनेरा ॥
परकी चुगली हित कर करैं । गुरूके बचन न हिरदै धरैं ॥
रिण देवैं अरु ब्याज बढ़ावैं । ताका धान खुशी हो खावैं ॥
ब्याज लैन में भारी हान । निरफल जाय करै जो दान ॥
हाय हाय कर जनम गंवावै । सब कुछ रख संतोष न आवै ॥
संकल फांसी जिन गल माहीं । दक्षिण द्वारे होते जाईं ॥१५॥

नासकेतलीलावर्णन । ६०७
दोहा ॥
दक्षिण द्वारे. और हैं, सबै नरक दुखदाय ।
अति कलेश जहां होत है, पतितन कूं हां जाय ॥ १६ ॥
सुनो ऋषी अब कान दे, जमदूतों का रूप ।
काले सुरमे की तरह, अति ही घोर सरूप ॥ १७॥
जित पापी हाहा करै, हो रहा अति ही शोर ।
अंधकार ऐसा जहां, सूझै निस नहिं भोर ॥ १८ ॥
चौपाई ॥
जहां किरम कुत्ते अरु कागा । बीछू रीछ अरु काले नागा ॥
अरु कांटे लोहे सम भाला । चीते गिद्ध सिंह बिकराला ॥
जमके दूत जहां बलकारी । लोहे के मुगदर कर भारी ॥
जासूं पतितन के सिर मारैं । त्राह त्राह कर बहुत पुकारैं ॥
उस द्वारे में नरक घनेरे । सो मैं अपनी आखों हेरे ॥
सुनत रोम ठाढ़े होजावैं । कंपै कलेजा अति थहरावैं ॥
सुनो ऋषी मै कहूं जु सारी । देख डरा उपजा भै भारी ॥
नरकोंमाहिं जीव बहु भरिया । मोदेखत बहुतक जहां गिरिया १६
दोहा ॥
नरक हजारों है जहां, हाय हाय ही होय ।
जीव पुकारत है पड़े, आगे सुनिये सोय ॥ २० ॥
तिनही में जो हैं बड़े, नरक अठारह मुख्य ।
नाव बखानूं जिनन के, अरु ह्वाँके सब दुख्य ॥ २१ ॥
चौपाई ॥
पहिले कुंभीपाक सुनावैं । जीवनकुं तामाँहि पकावैं ॥
दूजा नरकु अबीची खोला । लहर उठें जी खाँहि झकोला ॥
रौरव महा नरक जो भारा । जी रोवै बहु करैं पुकारा ॥

६०८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चौथा गुड़ जिम नरक महारे । गुड़ रस ज्यों औटत है हाँरे ॥
कूप नरक कूये सम जानों । लोहू पीप भराहै मानों ॥
महा कीट नरक बतलाऊं । तामें कीड़े भरे बताऊं ॥
असिपत्तर वन नरक कहीजे । खाँड़ेकी सम पात लहीजे ॥
नरक सुदारुण है भय भीता । तेज बड़ा तीक्षन दुख दीता॥२२॥
दोहा ॥
एक नरक निरस्वाँस है, तहाँ घुटे जो स्वाँस ।
ऐसा दुख हां होत है, ज्यों ठगमारी फांस ॥ २३ ॥
कुल संकुल जो नरक है, ताही कूँ सुनलेह ।
पापी कूँ संकलों सहित, जकड़े वाकी देह ॥ २४ ॥
चौपाई ॥
सूचीमुख पापी जो पावै । सुई छेक मुख हो गिरजावै ॥
महाघोर नरक अति भारी । तामें भैहै अधिक अपारी ॥
सूलही रूप नरक कूँ जानौं । सूली की ज्योताही पिछानौं ॥
नर्क अगनकुण्ड महातपत है । ताकूँ देखे हिया कंपत है ॥
नरक तेल जंत्र जो देखा । कल्हू की समताहि बसेखा ॥
दुखद दुख की खान घना है । नरक वही दुखरूप बना है ॥
अंधकार जो नरक बताऊं । महा अंधेरा तहाँ सुनाऊं ॥
नरक विलोचन वही कहावे । जहाँ जाये अंधा होजावे ॥२५॥
दोहा ॥
अति गरमी जाड़ा घना, भयानक खग सुन लेह ।
परवत सँू दैं डारिकैं, सस्तर छेदैं देह ॥ २६ ॥
ऐसे ऐसे दुख घने, पततन बारमबार ।
खोटे कर्मन के किये, दुखी लखे नर नार ॥ २७ ॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने नरकवर्णनोनाम अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

नासकेतलीलावर्णन । ६०६
ऋषि उवाच ॥ दोहा ॥
नरक इकट्ठे तुम कहे, नासकेत महाराज ।
जुदे जुदे बरनन करो, हमें सुनावो आज ॥१॥
नासकेत उवाच ॥ चौपाई ॥
नासकेत कहै सबै सुनाऊं । एक एक कूँ जुदा दिखाऊं ॥
सभी ऋषीजो ह्वां चित दीजै । नरकोंकी गति सब सुनलीजै ॥
पहिले कुंभीपाक कहतहूं । ता डर सं हरिध्यान धरतहूँ ॥
जा जा पापी जहां परत है। जम जिनकूँ बहु मार धरतहै ॥
उन पापी जो पाप कमाये । सो तुमसूं अब कहूं सुनाये ॥
गऊ ब्राह्मण पशु बहु मारै । पक्षी आदि जीव हनडारै ॥
दानकरत भांजी जो मारै । अरु ब्रह्मचारी का तप टारै ॥
और गरीबन कूं हनडारै । और मित्रका घात विचारै ॥
सोवे कुंभी नरक मँझारी । जाय परत है नरकें नारी ॥
कुंभीपाक कहूं परवाना । जाका मुख है घड़े समाना ॥
सोलह जोजन तल बिस्तारा । बहुदुख पावे गिरने हारा ॥
बड़े बड़े कीड़े लग जाहीं । महादुर्गंध बुरी तिह माहीं ॥
तामें बहुत बरस दुख पावै । पाप भुगत कर बाहर आवै ॥
दूजा नरक अवीची आगे । वामें गिरै पाप अस लागै ॥२॥
दोहा ॥
अधम संग जोपै करै, कन्या डारै मार ।
अभक्ष भक्ष गुरु कूं हनै, गर्भ गिरावै नार ॥ ३ ॥
जो कोइ अवै पाहुना, अपने घरके माहिं ।
अनजल की पूछी नहिं, आदर दीया नाहिं ॥ ४ ॥
चौपाई ॥
नरक अवीची में दुख भारी । पापी भुगतें नर कहा नारा ॥

६१० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बहुत बरस निकसन कूं लागै । जैसी करै सो आवै आगै ॥
तीजा नरक महा भयकारी । रौरव नांव जहां डरभारी ॥
ताकूं देख कंपत है देही । शुभकर्मों बिन कौन सनेही ॥५॥
दोहा ॥
जामें तप्ती रेत है, सूरज सदा तपाय ।
इकरस जलताही रहै, नैकन कभू सिराय ॥ ६ ॥
चौपाई ॥
रोवैं जीव अनेक पड़ेही । कबहूं बैठैं कबहुं खड़ेही ॥
अति व्याकुल तिनकौं दुखभारा । त्राह त्राह कर उठैं पुकारा ॥
करम कहूँ उनके अब कीये । ता पापन सूं वामें दीये ॥
पहल नारि सूं भोग विचारै । रूप ढरै तब मन सूं डारै ॥
राजविषै जिन न्याव न कीना । अपनी परजाकूं दुख दोना ॥
बिन औगुन डांडै अरु मारै । करै कुन्याय बंध में डारै ॥
अरु जिन ब्राह्मण वेद पुराना । पढ़ि पढ़िके कछु भेदन जाना ॥
वेदनमें के कर्म न कीने । पाखण्ड कर करही द्रव्यलीने ॥
आनदेव अरु गिरह पुजाये । हरि ओरी कूं नाहि लगाये ॥
पेटकाज भूम डारत डोलै । अपने स्वारथ मिथ्या बोलै ॥७॥
दोहा ॥
ब्राह्मण क्षत्री वैश्य जो, अरु शुदर जगमांहिं ।
अपने अपने धरमकी, राह संभारत नांहि ॥८॥
चौपाई ॥
राह वेद की चलते नाहीं । बे मरजाद रहैं जगमाहीं ॥
संक्रायत व्यतिपात न जानैं । द्वादसी मावस ना पहिचानैं ॥
समय पायहु दान न दीया । रसना हरिका नाम न लीया ॥
तिथि अरु परबी समै न साधी । चौकान्हान तजा अपराधी ॥

नासकेतलीलावर्णन । ६११
संयम पूजा कछू न जानी । बेमुख चाल चला मनमानी ॥
तरपन अरु नित नेम न कीना । गायत्री में चित नहिं दीना ॥
अरु पूरा सतगुर नहिं करि हैं । रौरव नरक मांहि सो परिहैं ॥
चौथा नरक सो गुड़ जिम जानौ। औटत रहत कड़ाहा मानौँ ९॥
दोहा ॥
जामें पापी जीवही, परत आयही आय ।
जिन पापों से गिरत है, सो मैं कहूं सुनाय ॥ १० ॥
चौपाई ॥
जो काहू के बसन चुरावै । विद्या पढ़ गुरकूँ बिसरावै ॥
काहू कारज भांजी मारै । अरु कहू का बुरा बिचारै ॥
सकर काहू की हर लावै । और लोह गुड़ नून चुरावै ॥
गुड़ जिम नरक सुभुगते सोई । तामें अधिक महादुखहोई ११॥
दोहा ॥
कूप नरक है पांचवां, जाका करूं बखान ।
तामें लोहू पीप है, कूंवेकी सम जान ॥ १२ ॥
चौपाई ॥
तापै काग बहुत घिर रहिया । बड़ी चोंच लोहे सम घरिया ॥
तामें पापी कूं गहि डारै । तिरआवै वह चोंचहि मारै ॥
बड़े पतित मूरख अभिमानी । जनम पाय हरिभक्ति न जानी॥
पूरा सतगुरु ढूंढ़ न कीना । परमेश्वर का नाम न लीना ॥
साधन की संगति नहिं कीनी । कथा कीरतन सुरत न दीनी ॥
अरु दासी सँग गमन करत है । सोभी याही नरक परत है ॥
हिरदय दया क्षमा नहिं आई । मनुषा देही रतन गंवाई ॥
यासम पाप और कहा होई । कूप नरक में डूबै सोई ॥
महा कीट छठा जो देखा । कूप की जो ताहि बसेखा ॥

६१२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तामें विष्ठा बहुते भरिया । कुलबुलाट कीड़ोंने करिया ॥
बड़े बड़े कीड़े ता माहीं । पापी के तनमें चिपटाहीं ॥
भली वस्तु जिन छिपकर खाही । आप अकेले दिया न काही ॥
आपही आप सुगन्ध लगाई । काहूका लिया अन्न चुराई ॥
अरु ऐसे बहु पाप कमावै । सो महाकीट नरकमें जावै १३॥
दोहा ॥
नरक सातवाँ जानिये, असिपत्तरबन नांव ।
दरखत की सम है बड़ा, पातदु धारै श्याम ॥ १४ ॥
चौपाई ॥
ज्यों तरवार पात वे पैने । पतितनकूँ भारी दुखदैने ॥
पापी कूं वा नीचै लावै । खड़ा करै नाहीं बैठावै ॥
पात झड़े खांड़े सम लागे । कटै माँस हाड़ ही ताकै ॥
त्राहि त्राहि जहां होरही भारी । सुनकर चेतै नाहिं अनारी ॥
सुनौ ऋषीश्वर और तमासा । देखा धरमराय के पासा ॥
काहू जमका कोइल बाहन । कोऊ काग चढ़े ही जाहन ॥
कोऊ हिरन चढ़ा ही जावै । कोऊ गीदड़ चढ़ा डरावै ॥
उनके मुख विकराल बने हैं । नानाविध भये रूप ठने हैं ॥
कालारंग कठोर बड़ेही । अधिकी तामस भौंह चढ़ेही ॥
नेतर लाल डरावन तीखे । दुखदाई वे पापी जीके ॥
तनमाहीं दुरगन्ध जु आवै । लांबी काया अति डरवावै ॥
मोटी देही ऊंचे केश। बहुतोंकामुख करहै भैसा ॥१५॥
दोहा ॥
बहुतों के मुख श्वान से, बहुतों के मुख बाघ ।
बहुतक चीते मुखबने, बहुतों के जों नाग ॥ १६ ॥

नासकेतलीलावर्णन । ६१३
आनन बहुत बिलाव से, बहुतन के मुख बैल ।
घोड़े से मुख बहुत हैं, चित खोटे तनमैल ॥ १७ ॥
थोरे से बरनन किए, अरु मुख नाना रूप ।
तनमाहीं जौं रोंगटे, दीखत है बिट रूप ॥ १८ ॥
चौपाई ॥
काहूके करमें तिरशूला । काहूके कर जलता पूला ॥
काहू हाथ में तीक्ष्ण बरछी । कै तोपैं तलवारैं तिरछी ॥
बहुतौं के कर मुगदर भाले । गदा कुल्हाड़े हैं विकराले ॥
बहुतौं के कर मूसल लाठी । बहुतों के कर लोहे साठी ॥
और गोफन है हाथौं तिनके । और और कर सस्तर जिनके ॥
सस्तर लीयें जु गिनती नाहीं । ऐसे दूत लखे ऊंह ठांहीं ॥
धरमराय की आज्ञा साथा । छेदत हैं पतितन के गाता ॥
मारैं बांधै दया न नेको । महाकलेश तहां मैं देखो ॥ १६ ॥
दोहा ॥
-नासकेत ऐसे कही, नैनों देखी बात ।
रनजीता यों कहत है, सब ऋषियों के साथ ॥ २० ॥
चौपाई ॥
और दूत घोरी मुख तिनका । पैनी डाढ़ कान बड़ जिनका ॥
मोटे होठ खड़े जो केशा । नैनालाल अगन के भेशा ॥
ऐसे जम पतितन के ताहीं । डारैं असिपत्तरबन माहीं ॥
कामी क्रोधी जो नर जावैं । उन कूं वै बहुत्रास दिखावैं ॥
जो कोई काटै हरिया पीपल । और चुरावै बाड़ी में फल ॥
काटैं वृक्ष जीव दुख देवै । झूठी साख भरै दरब लेवै ॥
राखा बरत भंग कर डारै । गुरका धरम-सीस नहिं धार-॥

ऐसे पाप करें बजमारे । नरक सातवें जा हत्यारे ॥२१॥
इति श्री नासकेतोपाख्याने नरकवर्णनोनाम नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥
नासकेत उवाच ॥ दोहा ॥
नरक सुदारुण और है, महाकष्ट की खान ।
जहां कामी नर नारही, भुगतैं बहु दुख मान ॥ १ ॥
चौपाई ॥
बहुते खंभ नारकी सूरत । बहुते पुरुष रूपकी मूरत ॥
जो कोइ परतिरिया गल लावैं । जिनकों जलते खम्भमिलावैं ॥
कहैं कि अपना कीया भोगो । अब क्यों मनमें मानत सोगो ॥
वा नारी कूं लेह पिछाना । जाके संग बहुत सुखमाना ॥
विरथा मनुषा देह गँवाई । तुमर्ते खर कूकुर अधिकाई ॥
जो नारी पर पुरषा माती । खोटा करम किया वा साथी ॥
तिनके कारन खंभ तपाये । बहुती लाल किये उरलाये ॥
जमकहै यह तो जार तुम्हारे । इनकी सूरत लेहु निहारे ॥
जिनके संग काम बस रतियां । तुमतें भली गधी अरु कुतियां ॥
आगैसें सूझा नहिं तुमकूं । कै तुम सुना नहीं था हमकूं ॥
भुगतो याही नरक मँझारी । निकसन की आवै नहि बारी ॥
क्रिया जो काम अजोग निरारा । परमेश्वरका आयसु टारा ॥२॥
दोहा ॥
जरते थंभों बांधकर, मार कहै जम ओह ।
जो कुछ कीया जगत में, जाका फल अवलोह ॥ ३ ॥
त्रास इसी जमलोक का, सुनता था अकनाहिं ।
तन मन सूँ लागारहा, मैथुनही के माहिं ॥ ४ ॥
परवी अरु दिन बरतके, किया जो मैथुन कर्म ।

नासकेतलीलावर्णन । ६१५
विषय भोग बोरा भया, भूला शील अरु धर्म ॥ ५॥
चौपाई ॥
निरस्वास नरक विकरारा । जामें पतितन कूं दुखभारा ॥
ऐसे पापन सों हां जावै । जो वे गुरुकी बस्तु चुरावै ॥
ब्राह्मण तथा देवता होई । इनका अंश चुरावै कोई ॥
बूढ़े अरु बालक का लीया । माल चुराय बहुत दुख दीया ॥
कै बूढ़ी कै बिधवा नारी । तिनका दरब चुराय अनारी ॥
जाय परत है नरक मंझारा । श्वासरुकै जहां दुःख अपारा ॥
दसवां कुल संकुल जो देखा । तामें दुखहै अधिक विशेखा ॥
ब्राह्मण क्षत्री शुदर वैशा । भारी पाप किया जिन ऐसा ॥
मांस खाय मदिरा जिन पीया । सोवा नरक माहिं गहदीया ॥
मारा जीव मांस ले खाया । जाका पातक बहुत बताया ॥
मोल मंगाय लाय जो खावैं । सोभी पापी बहु दुखपावैं ॥
उसी ठौर मैं यही निहारा । भयानक अधिकी दुखहां भारा ॥
अगनरूप जलते द्रुम देखे । दस जोजन लांबे जु बसेखे ॥
जोंजन पांच घेर विस्तारा । एक एक का न्यारा न्यारा ॥
संकल सूं हां बांधै पापी । हाहा शब्द कहैं संतापी ॥
जम लोहे की लाठी मारैं । मुगदर सों सिर फोर ही डारैं ॥
उनका चिमटों चाम उपाड़ैं । सीसा तावैं मुख में डारैं ॥
वेतो जलते अधिक पुकारैं । ज्यों ज्यों जम तामसकर मारैं ॥६॥
दोहा ॥
नरक ग्यारवां कहतहूँ, सूचीमुख है नाम ।
तहां अधिक दुख होत है, महाबुरी वह ठांव ॥ ७ ॥
चौपाई ॥
जहाँ जायकै पापी पड़ई । जो कोई ऐसे करम करैई ॥

६१६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जिन्हों पराई नारी मारी । अरु सतगुरकी निन्दा धारी ॥
धरमशास्त्र वेद पुरानी । इनहूं की निन्दाही ठानी ॥
तीरथ की निन्दा मुखलावै । सो सूचीमुख नरकही जावै ॥
नरकजु महाघोर इक नाऊं । सो विकराल भयानक ठाऊं ॥
तामें शूकर सिंह अरु कागा । रहें भेड़िया काले नागा ॥
जिसने पाप किये बहुभारी । सो जावे वा नरक मँझारी
करम कमाये खोटे खोटे । ऐसे पाप किये जिन मोटे ॥८॥
चौपाई ॥
जो कोइ बैठ बाट क माहीं । एक एक कूं देखत जाईं ॥
पर तिरिया की ओरी झांकैं । जिनकी कागे निकासत आंखैं ॥
जो कोइ बनमें आग लगावैं । जिनका मांस सिंघही खावैं ॥
जो कोई पापी गांवही जारै । तिनकी देह भेड़िया फाड़ै ॥
परघर कूं जो पावक लावै । शूकर जिनके हाथ चबावैं ॥
जाने विष देकर नर मारे । खावैं तोड नागही कारे ॥
ऐसे वाही नरक मँझारा । वे दुख पावैं अधिक अपारा ॥
चरनदास कहैं नासहीकेता । भाषत है जो कुछ हां देखा ॥६॥
दोहा ॥
शूलरूप , इक नरक है, शूली की ज्यों जान ।
पाप किये जिन राजमें, सोई गिरत है आन ॥१०॥
चौपाई ॥
मीरगन कूं जिन तीर चलाये । करी शिकार मारले आये ॥
नाहक नर शूलों पर दोये । हेत दरब के ताचन कोये ॥
जो वा नरक माहिं ले बासा । बहुती दीखै अधिकी त्रासा ॥
करमनका फल छूटै नांहीं । देखै अपनी आंखों हांहीं ॥११॥

नासकेतलीलावर्णन । ६१७
दोहा ॥
और नरक है चौदवां, नांव अगन ही कुण्ड ।
ताहि लखै हियरा डरै, तप्त महा प्रचण्ड ॥१२॥
चौपाई ॥
पापी प्रानी कूं हां डारै । पड़ै नाहिं तो जम बहु मारै ॥
कहै पापी मैं बहुत पियासा । जल प्याकै फिर देवो त्रासा ॥
दूत कहैं सुन रे मतहीना । तैंतो दया धरम नहि चीन्हा ॥
जनमपाय यह भी नहिं कीना । काहू कूं जलदान न दीना ॥
जैंवत ग्रास न दीया पापी । नेवज की रोटी नहीं थापी ॥
ब्राह्मण कबहूँ नाहि जिमाया । गुरभाई को नाहिं खवाया ॥
अगन माहिं आहूत न जानी । भूखे कूं दिया अन्न न पानी ॥
धृग धृग रे मूरख नरलोई । अपना किया भुगत अबसोई ॥
बिन भुगतैं छुटकारा नाहीं । क्यों नहिं गिरता याके माहीं ॥
अब तुम अगन कुण्ड कूं झेलो । कोई न संगी भुगत अकेलो ॥१३॥
दोहा ॥
गहन जु सूरज चन्दका, तामें किया न दान ।
पेटभरा ज्यों बैल सम, करी न पुण्य पहिचान ॥१४॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने नरकवर्णनोनाम दशमोऽध्यायः॥ १० ॥
नासकेत उवाच ॥ चौपाई ॥
नरक तेल जंत्र इक नाऊं । कोल्हू सूरत ताहि सुनाऊं ॥
तामें पतित गिरत हैं जाई । करम किये ए लोग लुगाई ॥
जो कोई चोरी निन्दा करै । भूमि पराई लेत न डरै ॥
खेत बिराना मूसै चलिकै । परतिरिया कूँ छीनै बलकै ॥
सोतो तेल जंत्र के माहीं । पिलपिल पापी बहु दुख पाहीं ॥

६१८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
दुखद सोलवां वा भुगतावै। घीव तेल ज्यों मनुष चुरावै ॥
भक्ति छुटावै निगुरा करै। झूठे अवगुन काहू धरै ॥
वाकूँ तेल कड़ाहे तलैं। अपने नैनन देखै भलैं ॥
मदिरा अचवैं आमिष खावैं। तिनकूँ ताता तेल पिलावैं ॥
नरक सतरवां लेहु पिछाना अन्धकारज्योंकरूं बखाना ॥१॥
दोहा ॥
जो राकस वै जीव हैं, बड़ी आरबल देह ।
तन ऊंचा बल है घना, तहाँ परत हैं वेह ॥२॥
चौपाई॥
सुनौं कहूँ जो कुछ हां देखा। सो तुमसँ राखूँ नहिं नेका ॥
अस्थान कालका एक निहारा। जो मनुषों का करै संहारा ॥
महाभयानक वह अस्थाना। बड़े कष्ट सूं हो हां जाना ॥
देखा दूत एक हां भारी। जाका तन मोटा बलकारी ॥
दहने करमें दण्ड जु वांकै। बावैं में फांसी है जाकै ॥
आंखें रकत रूप बिकरारा। अरु भैंसे पर है असवारा ॥
अरु जो किंकर है वा पासा। उनका भी तनकालहीकासा॥३॥
दोहा ॥
और नाम किरतांत है, उसी काल का जान ।
अरु जो वाके दूत हैं, सो किरतांत पिछान ॥ ४ ॥
चौपाई ॥
एक समय वह धरमही राजा । अपने दूतन सूं कहो काजा ॥
अज्ञा ले जमदूत पधारे । दैतराज देखा तन भारे ॥
दूतन शस्तर तहाँ चलाये। दैतराज वै मार भगाये ॥
अरु दैतों ने बहुतक कूटे। भई लराई शस्तर टूटे ॥
धरमराय पै भागै आये। हां के कौतुक सबै सुनाये ॥

नासकेतलीलावर्णन । ६१६
कही कि दैतन हम कूं मारा । नैक न माना हुकमतु म्हारा ॥
धरमराय सुन बहुत रिसाया । कालरूप कूं निकट बुलाया ॥
दोहा ॥
कहा कि वाहों के बली, इनके संग हां जाव ।
दानों सहित जुझूप कूं, मार पकड़ ले आव ॥ ६ ॥
चौपाई ॥
जम की आज्ञा ले वह काला । जै जै शब्द कहत उठ चाला ॥
वाके संग दूत घन चाले । अतिभैमान महाबिक्राले ॥
अपने अपने शस्तर तौलैं । चलौ चलौ आपस में बोलैं ॥
काल वही जिनका है नायक । पतितनकूं भारी दुखदायक ॥
खांडा है दहिने कर माहीं । चन्द्रहास तिह नांव कहाईं ॥
फांसी लिये जु बायें हाथा । ऐसें गया दूत ले साथा ॥
दूत काल के अरु वे दाने । जुद्ध करनलागे घमसाने ॥
मुगदर बज्जर लाठी मारैं । गदा जु फांसी सेल सँभारैं ॥७॥
दोहा ॥
खडग सिला पत्थर बड़े, अरु मुष्ठों की मार ।
दोऊ ओर से चलत है, तनकी नाहिं सँभार ॥ ८ ॥
चौपाई ॥
ऐसा जुद्ध करै न डरावैं । देखत रोम खड़े होजावैं ॥
अन्त यहीं दूतौ वे मारे । दैत्यों के नायक जो हारे ॥
और काल नैं डंडौ मारै । तड़फै बहुत धरन पै डारै ॥
मुगदर गदा मार बस लाये । बांध फांसियों पकड़ चलाये ॥
धरमराय के आगे कीने । तब राजा वै नीके चीन्हें ॥
फिर कही इनकूं लेकर धावो । चित्रगुसही पै ले जावो ॥
आयसु ले फिर ह्वांई आये । चित्रगुसकूं जाय दिखाये ॥

६२० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चित्रगुप्त ने किया बिचारी । बड़ पापी हैं येसब भारी ॥९॥
दोहा ॥
दूतोंने जतनों सहित, बांधा सावहीधान ।
भाग न जावैं छूटकै, बलवन्ते परवान ॥१०॥
चौपाई ॥
फिर वे नरकमाहिं डलवाये । इनकूं बहुते त्रास दिखाये ॥
ह्वांसूं काढ़ें बहुतीबारा । फिर दें अगन कुण्डमें डारा ॥
ऐसे दैतन कूं भी देखा । पाप पुन्यका देवै लेखा ॥
तातें सुनों ऋषी परबीना । रहै नहीं धनवंता हीना ॥
ना रहै बली न बूढ़ा बारा । काल सभी का खानेवारा ॥
कै घरमें कै बनके माहीं । काल कहीं छोड़त है नाहीं ॥
काल वली की फिरै दुहाई । कोइ न छोड़ा रंक अरु राई ॥
ना कोई संगी ना कोई साथी । बहुतोंगहिगहि छोड़ी बाथी ११
दोहा ॥
तातें या संसार में, चित्त न लावो कोय ।
यह निहचै कर जानलो, अपना कोई न होय ॥१२॥
चौपाई ॥
मूये पाछै काकूं रोवैं । सुपना सा देखें जब सोवैं ॥
जब जागें जब कोइ न कोई । ऐसी भांती जग यह होई ॥
छोटी बड़ी आरबल जानौ । यह सब काल चरित्र मानौ ॥
ब्याधरोग में यह को परै । काल खेल यह सबही करै ॥
सबही सृष्ट कालमुख माहीं । कोट जतन सूं बचै जु नाहीं ॥
इसी जगत का ऐसा लेखा । ज्यों स्वांगी धर नाचै भेखा ॥
जैसे बाट बटेऊ जावैं । छांहि वृक्षकी टुक ठहरावैं ॥
फिर वह धूप माहि ही धावै । जबलगनाहि ठिकाना पावै १३

नासकेतलीलावर्णन ६२१
दोहा ॥
थोड़ा सुख संसारका, तामें दुःख अपार ।
चित मत दोजो तासमैं, मैं कहूँ बारम्बार ॥ १४ ॥
चौपाई ॥
साध संगत गुरचरन मनावो । तातें काल चपेट न खावो ॥
हरि की ओरी चित्त लगावो । यातें मुक्ति ठिकाना पावो॥१५॥
दोहा ॥
नरक विलोचन अब कहूँ, सो अठारवां जान ।
वे पापी वहां परत हैं, जिनकी दिष्टकुध्यान ॥ १६ ॥
चौपाई ॥
राह चलत तहिं जीव निहारैं । बाजे देखे तो बीमारैं ॥
परतिरिया जो देखत जावै । करै मनोरथ बहुत लुभावै ॥
क्रोधदिष्ट साधन कूं देखै । तिनकी निन्दा करै बसेसै ॥
देख किसीका पड़दा खोलैं । बिषै तमासे ही में डोलैं ॥
साध गुरू की ओर न झांकै । ठाकुरद्वारे प्रीति न राखै ॥
विधवा नारी काजल आंजै । आन पुरुषही के वै काजै ॥
ऐसे जो हो लोग लुगाई । तिन्हें नरक यह अतिदुखदाई ॥
गिरतैं बिन आंखन होजावैं । चीसैं बहुत महादुख पावैं ॥
रणजीत कहैं उन नैन निहारा । कहा ऋषिनसूं लखि विस्तारा॥
और अनूठा नरक बताऊं । सो पिरथी ऊपर दिखलाऊं १७॥
दोहा ॥
सो याही मृत्युलोक में, देखा अपने नैन ।
यह परगट प्रतिक्ष है, पापी कूं दुख दैन ॥१८॥
चौपाई ॥
जगमें नरक कहूँ अब खोलैं । महा कंगाल मांगते डोलैं ॥

६२२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
नागे भूखे और जडाये। जूताना जिनके ही पाये॥
पेट भरन कूं जतन करत हैं। बहुत पचैं ना उदर भरत हैं॥
हैं दारिद्री नितही रोगी। अंधरे कोढ़ी निसदिन सोगी॥
ऐसे देखो जो नर नारी। सब कूं जानौं नरक मंझारी॥
जो कोइ पड़े बंध के माहीं। जीवत नरक मांहिं भुगताईं॥
खोटा करतैं नाहिं डरावैं। जिन कूं प्यादे जम लेजावैं॥
औगुनगारे कूं बहु मारैं। पाछै जकड़ बंध में डारैं॥१९॥
दोहा॥
निरख परख निहचै करो, मन में लीजै जान।
अपनी आंखों देख लो, मैं जो किया बखान॥२०॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने यमशासनो नाम एकादशोऽध्यायः॥११॥
ऋषिरुवाच॥ चौपाई॥
कह ऋषीश्वर सुनहो दाता। नासकेत तुम परमगियाता॥
जगमें बसना दीखै ऐसा। रैन समै बृक्षपक्षी जैसा॥
राह माहिं ज्यों थका बटाऊं। बैठ छाहिं फिर चलै उठाऊं॥
आवा गवन यों जगत मंझारा। हमकूं डर लागत है भारा॥
तू जमलोक देखकर आया। हमकूं ऐसा ज्ञान दिढाया॥
अब इक बात पूछत है औरी। सभी ऋषीश्वर दोउ करजोरी॥
याका उत्तर हम कूं दीजे। हमें सनाथ आज तुम कीजे॥
सबै पापका फल दिखलाया। सो सब हमरे निहचै आया॥१॥
दोहा॥
पुन्य करन के फलन को, अब तुम कहो विचार।
जो जो देखो नैनही, सुखपावत नरनार॥२॥
चौपाई॥
जो ये लोग दान पुन्य करैं। फलपावैं कहा जब यह मरैं॥

नासकेतलीलावर्णन । ६२३
किरपा कर कर सबही कहिये । हम कूं भी ह्यां कीया चहिये॥
नासकेत उवाच ॥ चौपाई ॥
नासकेत जब वचन उचारा । सो सो कहूं जु नैन निहारा ॥
जगमें सील दयाही सुखिया । पुण्यदान सू होवै सुखिया ॥
जो नर इनसेती चितलावैं । बाट माहिं बहुतै सुखपावैं ॥
कोयल राह बिरछ बहु फले । महा सुगन्ध छांहिं उनतले ॥
फलखाने कूं मारग माहीं । चढ़े बिमानन ऊपर जाई ॥
मनुषा जनमपाय जिन कीन्हा । जीवत दान कछू ह्यां दीन्हा ॥
आय मिलत हैं मारग माहीं । सुख आनन्द सूँ खाते जाई ॥
जिन जीवों ऐसे पुन कीन्हे । दूध दही घृत दिये नवीने ॥ ३ ॥
दोहा ॥
नाना भांत मिठाइयां, अरु मेवा दई जान ।
नाना विध भोजन दिये, सोई मिलत हैं आन ॥ ४ ॥
जो कछु करै सो आपकूं, परकूँ करै न कोय ।
अपना कीया पाय है, नीच ऊँच क्यों न होय ॥ ५ ॥
चौपाई ॥
आगे बाजे बजते जावैं । हरिजस अधिक नायका गावैं॥
ऐसैं जावैं स्वरग मंझारै । लैन अप्सरा आवैं द्वारै ॥
निरत करत भीतर लेजावैं । सिंहासन ऊपर बैठावैं ॥
धरम नीक कूं देखें कोई । उठ उठ आन मिलत है सोई ॥
बहुतक जहां अप्सरा नारी । दिव बस्तर दिव भूषन वारी ॥
चोवा चन्दन कोई लगावै । कोई चावसों पवन दुरावै ।
कहै कै हमतो तुमरी दासी । हम तुम रहें सदाही पासी ॥
एक साथ मिल हरिगुन गावैं । करें विलास परम सुखपावैं॥६॥

६२४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दोहा ॥
केलि करें स्वरग लोकमें, जिन किये ऐसे दान ।
जुदे जुदे चरनदास अब, ताको करै बखान ॥ ७ ॥
चौपाई ॥
जिन तलाव अरु कुएं खुदाये । बाट माहिं जिन दुरम लगाये ॥
अरु जिन ऐसे दत्तव कीने । बहुत दान विप्रन कूँ दीने ॥
सोना रूपा मंगे मोती । पन्ना हीरा उज्जवल जोती ॥
माणक चुन्नी और नगीना । दान जवाहरका जिन दीहा ॥
गहने भाड़े सिज्या दीनी । मन्दर भूमिदान जिन कीनी ॥
ताँबा और कपूर-सुहाये । अन्नदान भोजन जिन ख्वाये ॥
ऐसी बस्तें देने वारे । जाय बसत हैं स्वर्ग मंझारे ॥
पहिले धरमराय पै जावें । गण सुख सूं ले ले ही धावैं ॥८॥
दोहा ॥
खड़ा करें धर्मराय ढिग, कर-कर बहुती चाव ।
तब राजा ऐसें कहैं, स्वर्गलोक लेजाव ॥ ६ ॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने स्वर्गमार्गवर्णनोनाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
नासकेत उवाच ॥ दोहा ॥
अब स्वर्गों का कहत हूं, जुदा जुदाही नावैं ।
शुभकर्मन सूं पाइये, ऐसी उत्तम ठावैं ॥ १ ॥
पहिला स्वर्ग सुहावना, है कुबेर का लोक ।
यक्ष गन्धर्ब जहाँ अपसरा, भोगीम हा अशोक ॥ २ ॥
लोक बरुनकी छवि घनी, रतन जुड़े अस्थान ।
बाग घने शोभा घनी, बड़े सुखों की खान ॥ ३ ।
इन्दर की अमरावती, रही स्वर्ग छवि धार ।
नृत्य करत हैं अप्सरा, अधिकी जहाँ बहार ॥ ४ ॥